जीवन के कुछ सार | Some essence of life

सम्पूर्ण आकाशीय पिण्डों में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा पिण्ड है जहाँ प्राणी बसते हैं। यहाँ अनेक छोटे-बड़े वनस्पतियों और प्राणियों में जीवन के चिह्न पाये जाते हैं, मनुष्य भी उन्हीं में से एक है। बौद्धिक विकास के कारण मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है। फिर भी उनकी जीवन यात्रा सत्तर से सौ वर्ष तक की ही है। शायद ही कुछ लोग उससे आगे बढ़ पाते हैं। इनमें से अधिकांश लोगों का सारा जीवन व्यस्तता में बीत जाता है। अपने जीवन के बारे में उन्हें सोचने समझने की फुर्सत ही नहीं होती।

जीवन को सार्थक बनाने के लिये उसकी सच्चाई को जानना-समझना आवश्यक होता है। जीवन क्या है? जन्म के पहले यह क्या था? मरने के बाद उसका अस्तित्व क्या होगा? ईश्वर कौन और कहाँ है? संसार के सारे लोग उसके महत्त्व को क्यों स्वीकार करते है? ये कुछ ऐसे अनसुलझे प्रश्न हैं जिसका उत्तर आसानी से प्राप्त नहीं  हो पाता। यदि मनुष्य जीवन की गति को बनाये रखना चाहता है तो उसे प्रकृति के सौन्दर्य की प्रशंसा करनी पड़ेगी। प्रयत्नपूर्वक शरीर की रक्षा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उसे सुख-दुख को स्वीकार करना होगा।

नारी केवल पुरूष की वासना का प्रतीक या खिलौना नहीं  है, उसकी सहधर्मिणी भी है, इस तथ्य को स्वीकार करना होगा। पुरूष पर आश्रित रहकर भी वह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं।

देवता या दानव, किसी भी रूप में जिज्ञासु होकर ही मनुष्य ने संसार को आधुनिकता के ढ़ाँचे में ढ़ालकर अपने लिये और दूसरों के लिये भी इसे समृद्ध और आकर्षक बना दिया है। धन संग्रह हो या धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ति, इसके लिये शरीर की रक्षा भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि संसार के सारे अच्छे बुरे कार्य शरीर धारण करने पर ही पूर्ण होते हैं। कर्म का फल भी शरीर को ही भुगतना पड़ता है। हर मनुष्य के शरीर की क्षमता भी सीमित होती है तथा यह निरंतर विनाश की ओर अग्रसर होता रहता है। फिर भी अपने विश्वास के आधार पर मनुष्य को भूत और भविष्य की चिन्ता छोड़कर वर्तमान समय में ही अच्छे या बुरे कर्म के लिये तत्पर होना पड़ता है। ये ऐसे तथ्य हैं जो मानव जीवन के सत्य हैं और स्वीकार करने योग्य हैं

 

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