योग आनन्दमय जीवन जीने की कला | Yoga Art of living a joyful life

सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के मन में एक ऐसी योनि के निर्माण का विचार आया जो अन्य सभी से श्रेष्ठ, समर्थ, समुन्नत तथा शक्तिशाली हो। तब उन्होंने मनुष्य की रचना शुरू की। इसके पूर्व वे पशु-पक्षी, कीट-पतंग, देव-दानव, यक्ष-गंधर्व आदि नाना प्रकार के जीवधारियों की रचना कर चुके थे। फिर उन्होंने मनुष्य को वे सारी क्षमताएँ प्रदान की जो अन्य जीवधारियों में विद्यमान थीं। इसके अलावा उसमें स्वरूपावस्था का ज्ञान और मुक्त होने की क्षमता भी थी। इस प्रकार ब्रह्मा जी ने मनुष्य के रूप में एक सर्वगुण सम्पन्न, विवेकी, ज्ञानी तथा सत् चित् आनंद स्वरुप योनि का सृजन किया। यह बात जब अन्य जीवधारियों को पता चली तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। देवता भी ईर्ष्या से भर गये। देवताओं के नेतृत्व में सभी लोग ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और कहने लगे कि जब सारी शक्तियां, सारी प्रतिभाएँ, मनुष्य को ही देनी थी तो आपने हम लोगों को बनाया ही क्यों? मानव को आपने इतना समग्र और शक्तिशाली बना दिया कि इसे और किसी की कोई आवश्यकता ही न रहेगी।
 
परम तत्व से परिचित यह जीव न तो किसी से डरेगा और न ही किसी को पूजेगा। जब इसके सामने संसार में हमारा कोई महत्व ही नहीं रहेगा, तो फिर हमारे होने या न होने का प्रयोजन ही क्या? ब्रह्मा जी ने सबकी बातों को ध्यान से सुना और उस पर गम्भीरता से चिंतन-मनन किया। फिर उन्होंने मनुष्य के अंतःकरण में कुछ परिवर्तन कर दिया और देवताओं से कहा कि आप लोग निश्चिंत होकर जाइए, मैने आप की समस्याओं समाधान कर दिया है। अब यह अपने स्वरूप को भूल जाएगा, आज के बाद से जो चीजें इसके भीतर छिपी होंगी उन्हें यह बाहर खोजेगा।  
 
कहा जाता है कि मनुष्य उसी समय से भीतर देखने की कला भूल गया, और हर चीज को बाहर खोजने लगा। फलस्वरूप दिन प्रतिदिन वह स्वयं से दूर होता गया, कमजोर होता गया, पराधीन होता गया, दुःखी होता गया आज भी वही सब चल रहा है। शांति हमारे भीतर है, लेकिन उसे हम बाहर खोज रहे हैं। आनंद हमारे भीतर है, लेकिन उसे हम बाहर खोज रहे हैं। आरोग्य हमारे भीतर है, लेकिन उसे हम बाहर खोज रहे हैं। परमात्मा हमारे भीतर है, लेकिन उसे हम बाहर खोज रहे हैं। हम बाहर देखने के इतने अभ्यासी और आदी हो चुके हैं कि भीतर देखने की हमारी क्षमता ही नष्ट हो गई, संभावना ही क्षीण हो गई।
 
योग भीतर देखने की कला है, योग भीतर झाँकने की विधि है, योग भीतर की ओर चलने का मार्ग है। बहुत दौड़ लगा ली संसार की, बहुत यात्राएँ कर लिए वाह्य जगत की। क्या दिखा? क्या मिला? सिवाय एक मृगतृष्णा के। जिस प्रकार एक हिरन अपने कुण्डल में स्थित कस्तूरी को खोजने के लिए सारे जंगल में भटकता फिरता है उसी प्रकार आप भी एक बेहोशी की हालत में, एक मूर्छा की अवस्था में, वाह्य जगत का विचरण करते जा रहे हैं, करते जा रहे हैं। और इसमें इस तरह से उलझे हुए हैं कि कभी पीछे मुड़कर देखने का खयाल तक नहीं आने पाता। लेकिन एक बात गाँठ बाँध लीजिए कि यह सफर अंतहीन है, न तो यह आपको कहीं पहुँचाएगा और न ही कभी इसका अंत होगा। आप जीवन भर जो रेत के घरौंदे बनाते हैं वह अचानक एक ही झटके में भरभराकर गिर जाते हैं, मिट्टी में मिल जाते हैं। आप जीवन भर समृद्धि के जो दीये जलाते हैं वे सब के सब हवा के एक ही झोंके में बुझ जाते हैं।
 
आप सारी जिंदगी रात दिन एक करके जो कुछ भी इकट्ठा करते हैं उसे एक ही झटके में मौत आपसे छीन लेती है। आपके पास बचता क्या है? अंततोगत्वा आप एक हारे हुए जुआरी की भाँति दीन-हीन व अकेले नजर आते हैं, एकदम अशक्त, अवाक और किंकर्तव्यविमूढ। उद्देश्य को भूलकर, संसार को पा रहे हैं स्वयं को खो कर, लोगों के निकट जा रहे हैं स्वयं से दूर होकर। इस प्रकार आप कैरियर में, व्यवसाय में, राजनीति में अथवा किसी अन्य क्षेत्र में आये दिन नये-नये कीर्तिमान तो स्थापित कर रहे हैं पर उसके लिए जो कीमत चुका रहे हैं वह बहुत अधिक है। यह बिल्कुल घाटे का सौदा है, किसी भी दृष्टि से लाभदायक नहीं। अपने भीतर झाँकने का प्रयत्न करें, स्वयं को पहचानने का प्रयत्न करें। इसी में सर्वशांति निहित है।

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