मानव जीवन क्या है? | What is human life?

संसार के आधुनिकतम दूरदर्शक यन्त्र से देखे जाने पर भी पृथ्वी के अलावा ब्रह्माण्ड में कहीं भी जीवन का कोई लक्षण दिखाई नहीं दे सका है। पृथ्वी पर मनुष्य के अतिरिक्त लाखों प्रकार के छोटे-बड़े जीव, जन्तु तथा पेड़ पौधों में जीवन के लक्षण पाये जाते हैं। जिनमें जीवन के लक्षण पाये जाते हैं वे सभी सजीव हैं। मनुष्य इन सबों में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। नवीनतम खोजों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि जीवन के मूलभूत स्त्रोतों में DNA (डाइरिवो न्यूक्लियिक एसिड) तथा RNA (रिवो न्यूक्लियिक एसिड) की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सभी जीवित कोशिका के संश्लेषण में ये तत्त्व में मूलभूत रूप से निश्चित रूप में मौजूद होते हैं। फिर भी जीव वैज्ञानिक इन मूलभूत तत्त्वों से जीवित कोशिका के संश्लेषण में अबतक सक्षम नहीं हो सका है। इस तरह जीवन के नियामक तत्त्व के रूप में ईश्वर का एकाधिकार अबतक बना हुआ है।

यों तो अण्डाणु और शुक्राणु के मिलन (निषेचन) के बाद जब भ्रूण का निर्माण होता है तो जीवन का आरम्भ हो जाता है। किन्तु जब गर्भावस्था के बाद बच्चे का जन्म होता है तब वास्तविक रूप से जीवन का आरम्भ होता है। बच्चे के जन्म के साथ हीं मृत्यु की आशंका भी सामने आ जाती है। अनेक अवरोधों को पार करता हुआ मानव जीवन सीढ़ी-दर-सीढ़ी आगे बढ़ता जाता है। जन्म के साथ ही मौत का साया हमेशा जीव को घेरे रहता है। लेकिन पूर्वजों से प्राप्त कोशिकाओं की बनावट से प्राप्त की गई उर्जा तथा पोषक खाद्य पदार्थों से प्राप्त की गई उर्जा के कारण जीवों के जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती चली जाती है। 

संसार में प्राप्त होनेवाले जीवों में छोटा और सरल बनावट वाला जीव अमीबा कुछ ही समय में समाप्त हो जाता है, जबकि क्लिष्ट बनावट और बड़े आकार वाले जीव लागभग तीन सौ वर्षों तक जीवित रहते हैं, लेकिन उच्च कोटि की आनुवंशिक संरचना, खाद्य के रूप में पौष्टिक तत्त्वों का सेवन तथा आराम और तनावरहित जिन्दगी जीनेवाले मनुष्य सौ, सवा सौ वर्ष तक हीं जी पाते हैं। शास्त्रों में लम्बी आयु प्राप्त करने वाले कुछ लोगों की चर्चा है लेकिन उसका कोई प्रामाणिक आधार नहीं है।

जन्म के बाद लगभग बारह वर्ष तक की अवस्था को बचपन कहा जाता है। बच्चों की यह उम्र माता-पिता तथा अभिभावक द्वारा उसके पालन पोषण की अवस्था होती है। इस अवधि में बच्चे बोलना, खाना तथा खेलना सीखतें हैं। इस अवस्था में लड़कों तथा लड़कियों की शारीरिक तथा मानसिक बनावट में बहुत कम अन्तर होता है। इस अवस्था में दोनों तरह के बच्चे छोटे-मोटे काम तथा व्यवहार की बातें अपने अभिभावक या गुरू से सीखतें हैं। बच्चों के शारीरिक तथा बौद्धिक विकास की यह प्रारम्भिक अवस्था होती है, जब वे जीवन के लिये उपयोगी शिक्षा प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होते हैं। बचपन की अवस्था बीतते-बीतते लड़के, लड़कियों की शारीरिक तथा मानसिक बनावट में फर्क आने लगता है।

नवयौवन की यह अवस्था लगभग पच्चीस वर्षों तक बनी रहती है। लड़के और लड़कियाँ शारीरिक बनावट में अन्तर के कारण अब नवयुवक और नवयुवती बन जाते हैं। उनमें परस्पर आकर्षण का भाव पैदा हो जाता है, लेकिन इस अवस्था में उनके बौद्धिक विकास में कोई विशेष फर्क नहीं होता। इस समय तक वे आगे की जिन्दगी जीने के लिये ज्ञानार्जन कर हर तरह से अपने को तैयार कर लेते हैं। इस अवस्था में परस्पर आकर्षण के कारण परिणय सूत्र में बँधकर वे सृष्टिक्रम को जारी रखने का भी प्रयास करते हैं। पच्चीस वर्ष से लेकर पचास वर्ष तक की अवस्था मनुष्य की युवावस्था होती है। मानव जीवन की यह सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था है। इस अवस्था तक मनुष्य शारीरिक और मानसिक दृष्टि से परिपूर्ण हो चुका होता है। मनुष्य के सारे बौद्धिक और शारीरिक कार्य इसी अवस्था में पूरे होते है। इस अवस्था में मनुष्य अपनी क्षमता के अनुसार कार्ययोजना बनाता, उसे पूरा करने के लिये प्रयासरत होता तथा कठिन परिश्रम द्वारा सफलता प्राप्त कर अपने जीवन को उत्कर्ष तक पहुँचाने का प्रयास करता है।

पचास वर्ष से अधिक सत्तर वर्ष तक की अवस्था मनुष्य के जीवन की प्रौढ़ावस्था होती है। इस अवस्था में भी मनुष्य बौद्धिक उत्कर्ष का बहुत सा कार्य पूरा करता है। इस अवस्था में कोशिकाओं की कार्यक्षमता घटने लगती है जिससे शरीर की शिथिलता बढ़ जाती है तथा रोगों की संभावना में भी वृद्धि होती है। सत्तर वर्ष से अधिक की अवस्था मनुष्य की वृद्धावस्था कहलाती है। इस अवस्था में मनुष्य के सारे अंग कमजोर पड़ने लगते हैं। अधिकांश लोगों में निर्णायक क्षमता भी कमजोर हो जाती है। नब्बे की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते अधिकांश मनुष्यों की शारीरिक क्षमता इतनी कम हो जाती है कि उनका कोई न कोई महत्त्वपूर्ण अंग काम करना बन्द कर देता हैं जिससे उनकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है।

बहुत कम ही लोग शतायु हो पाते हैं। कुछ गिने चुने लोग ही ऐेसे है जो सौ से अधिक की उम्र तक जीते हैं। उनकी शारीरिक क्षमता इतनी कम हो जाती है कि वे सामान्य जिन्दगी जीने में भी कठिनाई महसूस करते हैं। प्रायः उनकी बुद्धि भी शिथिल हो जाती है। मानव जीवन की यह कहानी सभी स्त्री, पुरूष पर समान रूप से लागू होती है। इसलिये यह जीवन का सत्य है। मानव जीवन की सच्चाई को जानने-समझने वाला व्यक्ति ही जीने की कला में निपुण हो सकता है।

मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक की लगभग सौ वर्षों की जिन्दगी भी क्षणभंगुर होती है। किसी भी समय इसका अन्त हो जाता है। मृत्यु के साथ ही उसके सारे गुण और अवगुण, सारे अच्छे और बुरे कार्य इतिहास के विषय बन जाते हंै। कुछ बड़े लोगों को छोड़कर अधिकांश लोगों को कुछ समय तक ही उसके परिजन और दोस्त याद करते हैं, फिर सबकुछ अतीत के गर्भ में समा जाता है। यही कारण है कि ज्ञानी पुरूष इस थोड़े समय की जिन्दगी पर गर्व नहीं करते हैं। वे जबतक जीते हैं अपने आचरण और व्यवहार से समाज में आदर्श स्थापित करते हैं। वे मानते हैं कि जब मनुष्य जन्म के साथ कुछ लेकर नहीं आता और न मौत के साथ कुछ लेकर जाता है तो फिर गलत तरीके से अर्जन करना तथा आगे की पीढ़ी के लिये, जिसके भविष्य को वे नहीं जानते जमा करना बुद्धिमानी नहीं है। 

‘खाये खरचे जो बचे तो जोरिये करोड़’’

धन-बल-प्रतिष्ठा, बुद्धि तथा ज्ञान का उपयोग खुद अपने  और अपने परिवार तथा आस-पास के लोगों के हित साधन में करना ही बुद्धिमानी है। किसी का दिल दुखाकर तथा किसी को नुकसान में डालकर आनन्दमग्न होना किसी भी हालत मे उचित नहीं है। थोड़े स्वार्थ के लिये अपने और दूसरे के जीवन को संघर्षमय बना देना बुद्धिमानी तथा होशियारी का काम नहीं है। यही वास्तविकता है और जीवन का सत्य भी।

जब बड़े-बड़े लोगों के नहीं रहने से संसार का काम नहीं रूक सका तो हमारे नहीं रहने से संसार या संतति का काम रूक जायगा, यह हमारा भ्रम है। हमारे प्रयत्न से हमारी संतति सब दिन लाभान्वित होगी, यह भी हमारा भ्रम है। इसलिये सदाचार पूर्वक जीवन जीते हुए हर क्षण मृत्यु का सामना करने के लिये तैयार रहना ही श्रेयस्कर है। इसी में जीवन की सार्थकता भी है।

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