गुटेनबर्ग ने अपनी पहली पुस्तक की छपाई कैसे की | How did Gutenberg Print His First Book

गुटेनबर्ग ने अपनी पहली पुस्तक की छपाई कैसे की | How did Gutenberg Print His First Book

भाइयों बहुत सारे लोगों के मन में एक सवाल आता है कि हम जो किताब, अखबार एवं मैगजीन पढ़ते हैं आखिर यह किस प्रकार की मशीनों द्वारा छपाई की जाती है और इसकी रचना सर्वप्रथम कहां पर और किसने की आज हम इसी सारे विषयों पर आपको जानकारी देने वाले हैं। यह जानकारी बेहद ही दिलचस्प है कृपया इस लेख को पूरे अंत तक पढ़े और अच्छी जानकारी प्राप्त करें। प्रिंटिंग प्रेस की रचना सबसे पहले जर्मनी के जोहान गुटेनबर्ग ने की थी। इन्होनें सन् 1439 में प्रिंटिंग प्रेस की रचना की जिसे एक महान आविष्कार माना जाता है। इन्होने मूवेबल टाइप की भी रचना की। इनके द्वारा छापी गयी बाइबल गुटेनबर्ग बाइबल के नाम से प्रसिद्ध है।

उससे पहले लकड़ी के ठप्पों एवं टाइप से छपाई की तकनीक कुछ सौ वर्ष पहले से ही चीन में मौजूद थी लेकिन वे गुटनबर्ग की तरह एक दबाकर छापने वाली प्रेस का प्रयोग नहीं करते थे। गुटनबर्ग के प्रेस पर आधारित छपाई की विधि युरोप में बड़ी तेजी से फैली। इसके बाद वह सारे संसार में फैलती गयी। अन्ततः प्रिन्टिग प्रेस ने छपाई की परम्परागत विधियों ठप्पे एवं टाइप आदि को उखाड़ फेंका। इसी प्रकार बाद में ऑफसेट छपाई मशीन के आ जाने के बाद प्रिंटिंग प्रेस भी बीते जमाने के बात हो गयी।प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार से सूचना एवं ज्ञान के प्रसार में एक क्रान्ति आ गयी। इसलिये प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार एक महान आविष्कार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि पहले भाषा का प्रयोग, उसके बाद लिपि एवं लेखन का प्रयोग एवं उसके बाद प्रंटिंग प्रेस का आविष्कार, गुणात्मक रूप से दुनिया के तीन सबसे बड़े आविष्कार हैं जिन्होने ज्ञान एवं विद्या के प्रसार एवं विकास में भारी योगदान दिया।

गूटेनबर्ग का जन्म जर्मनी के मेंज नामक स्थान में हुआ था। 1420 ई. में उनके परिवार को राजनीतिक अशांति के कारण नगर को छोड़ना पड़ा था। उन्होंने 1439 ई. के आसपास स्ट्रासबोर्ग में अपने मुद्रण आविष्करण का परीक्षण किया। काठ के टुकड़ों पर उन्होंने उल्टे अक्षर खोदे। फिर उन्हें शब्द और वाक्य का रूप देने के लिए छेद के माध्यम से परस्पर जोड़ा और इस प्रकार तैयार हुए बड़े ब्लाक को काले द्रव में डुबाकर पार्चमेंट पर अधिक दाब दिया। इस प्रकार मुद्रण में सफलता प्राप्त की। बाद में उन्होंने इस विधि में कुछ सुधार किया।

इस प्रकार प्रथम मुद्रित पुस्तक ‘कांस्टेंन मिसल’ है जो 1450 के आस-पास छापी गई थी। उसकी केवल तीन प्रतियाँ उपलब्ध हैं। एक म्युनिख (जर्मनी) में, दूसरी ज्यूरिख (स्विटजरलैंड) में और तीसरी न्यूयार्क में। इसके अतिरिक्त एक बाइबिल भी गुटेनबर्ग ने मुद्रित की थी।

मुद्रणालय, प्रिंटिंग प्रेस, छापाखाना या छपाई एक प्रकार की प्रेस यांत्रिक युक्ति है जो दाब डालकर कागज, कपड़े आदि पर प्रिन्ट करने के काम आती है। कपड़ा या कागज आदि पर एक स्याही-युक्त सतह रखकर उस पर दाब डाला जाता है जिससे स्याही युक्त सतह पर बनी छवि उल्टे रूप में कागज या कपड़े पर छप जाती है। प्रारंभिक युग में मुद्रण एक कला था, लेकिन आधुनिक युग में पूर्णतया नई टेक्नालॉजी पर आधारित हो गया है। मुद्रण कला पत्रकारिता एवं प्रिंटिंग के क्षेत्र में तो जैसे क्रांति सी ला दी है।

सन् 105 ई. में चीनी नागरिक टस्त्साई लून ने कपस एवं सलमल की सहयता से कागज का आविष्कार हुआ। सन् 712 ई. में चीन में एक सीमाबद्ध एवं स्पष्ट ब्लाक प्रिंटिंग की शुरूआत हुई। इसके लिए लकड़ी का ब्लाक बनाया गया। चीन में ही सन् 650 ई. में हीरक सूत्र नामक संसार की पहली मुद्रित पुस्तक प्रकाशित की गयी। सन् 1041 ई. में चीन के पाई शेंग नामक व्यक्ति ने चीनी मिट्टी की मदद से अक्षरों को तैयार किया। इन अक्षरों को आधुनिक टाइपों का आदि रूप माना जा सकता है। चीन में ही दुनिया का पहला मुद्रण स्थापित हुआ, जिसमें लकड़ी के टाइपों का प्रयोग किया गया था। टाइपों के ऊपर स्याही जैसे पदार्थ को पोतकर कागज के ऊपर दबाकर छपाई का काम किया जाता था।

इस प्रकार, मुद्रण के आविष्कार और विकास का श्रेय चीन को जाता है। यह कला यूरोप में चीन से गई अथवा वहां स्वतंत्र रूप से विकसित हुई, इसके संदर्भ में कोई अधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक कागज बनाने की कला चीन से अरब देशों में तथा वहां से यूरोप में पहुंची। एक अन्य अनुमान के मुताबिक 14वीं-15वीं सदी के दौरान यूरोप में मुद्रण-कला का स्वतंत्र रूप से विकास हुआ। उस समय यूरोप में बड़े-बड़े चित्रकार होते थे। उनके चित्रों की स्वतंत्र प्रतिक्रिया को तैयार करना कठिन कार्य था। इसे शीघ्रतापूर्वक नहीं किया जा सकता था। अतः लकड़ी अथवा धातु की चादरों पर चित्रों को उकेर कर ठप्पा बनाया जाने लगा, जिस पर स्याही लगाकर पुराने रीति से ठप्पे को दो तख्तों के बीच दबाकर उनके चित्रों की प्रतियां तैयार की जाती थी। इस तरह के अक्षरों की छपाई का काम आसान नहीं था। अक्षरों को उकेर कर उनके छप्पे तैयार करना बड़ा ही मुश्किल काम था। उसमें खर्च भी बहुत ज्यादा पड़ता था। फिर भी उसकी छपाई अच्छी नहीं होती थी। इन असुविधाओं ने जर्मनी के लरेंस जेंसजोन को छुट्टे टाइप बनाने की प्रेरणा दी। इन टाइपों का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1400 ई. में यूरोप में हुआ।

इस प्रकार के टाइपों को पुनरावत्र्तक छापे (रिपीटेबिल प्रिण्ट) के वर्ण कहते हैं। इसके फलस्वरूप बहुसंख्यक जनता तक बिना रूकावट के समाचार और मतों को पहुंचाने की सुविधा मिली। इस सुविधा को कायम रखने के लिए बराबर तत्पर रहने का उत्तरदायित्व लेखकों और पत्रकारों पर पड़ा। जेहान गुटेनबर्ग ने ही सन् 1454-55 ई. में दुनिया का पहला छापाखाना (प्रिंटिंग-प्रेस) लगाया तथा सन् 1456 ई. में बाइबिल की 300 प्रतियों को प्रकाशित कर पेरिस भेजा। इस पुस्तक की मुद्रण तिथि 14 अगस्त 1456 निर्धारित की गई है। जॉन गुटेनबर्ग के छापाखाने से एक बार में 600 प्रतियां तैयार की जा सकती थी। परिणामतरू 50-60 वर्षों के अंदर यूरोप में करीब दो करोड़ पुस्तकें प्रिंट हो गयी थी।

इस प्रकार, मुद्रण कला जर्मनी से आरंभ होकर यूरोपीय देशों में फैल गयी। कोलने, आगजवर्ग बेसह, टोम, पेनिस, एन्टवर्ण, पेरिस आदि में मुद्रण के प्रमुख केंद्र बने। सन् 1475 ई. में सर विलियम केकस्टन के प्रयासों के चलते ब्रिटेन का पहला प्रेस स्थापित हुआ। ब्रिटेन में राजनैतिक और धार्मिक अशांति के कारण छापाखाने की सुविधा सरकार के नियंत्रण में थी। इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित करने के लिए सरकार से विधिवत आज्ञा लेना बड़ा ही कठिन कार्य था। पुर्तगाल में इसकी शुरूआत सन् 1544 ई. में हुई।

मुद्रण के इतिहास की पड़ताल से स्पष्ट है कि छापाखाना का विकास धार्मिक-क्रांति के दौर में हुआ। यह सुविधा मिलने के बाद धार्मिक ग्रंथ बड़े ही आसानी से जन-सामान्य तक पहुंचने लगे। इन धार्मिक ग्रंथों का विभिन्न देशों की भाषाओं में अनुवाद करके प्रकाशित होने लगे। पूर्तगाली धर्म प्रचार के लिए मुद्रण तकनीकी को सन् 1556 ई. में गोवा लाये और धर्मग्रंथों को प्रकाशित करने लगे। सन् 1561 ई. में गोवा में प्रकाशित बाइबिल पुस्तक की एक प्रति आज भी न्यूयार्क लाइब्रेरी में सुरक्षित है। इससे उत्साहित होकर भारतीयों ने भी अपने धर्मग्रंथों को प्रकाशित करने का साहस दिखलाया। भीम जी पारेख प्रथम भारतीय थे, जिन्होंने दीव में सन् 1670 ई. में एक उद्योग के रूप में प्रेस शुरू किया।

सन् 1639 ई. में पादरी जैसे ग्लोभरले ने एक छापाखाना जहाज में लादकर संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रस्थान किया, लेकिन रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उनके सहयोगी म्याश्यु और रिटेफेन डे ने उक्त छापाखाना (प्रिंटिंग-प्रेस) को स्थापित किया। सन् 1798 ई. में लोहे के प्रेस का आविष्कार हुआ, जिसमें एक लिवर के द्वारा अधिक संख्या में प्रतियां प्रकाशित करने की सुविधा थी। सन् 1811 ई. के आस-पास गोल घूमने वाले सिलेण्डर चलाने के लिए भाप की शक्ति का इस्तेमाल होने लगा, जिसे आजकल रोटरी प्रेस कहा जाता है। हालांकि इसका पूरी तरह से विकास सन् 1848 ई. के आस-पास हुआ। 19वीं सदी के अंत तक बिजली संचालित प्रेस का उपयोग होने लगा, जिसके चलते न्यूयार्क टाइम्स के 12 पेजों की 96 हजार प्रतियों का प्रकाशन एक घंटे में संभव हो सका। सन् 1890 ई. में लिनोटाइप का आविष्कार हुआ, जिसमें टाइपराइटर मशीन की तरह से अक्षरों के सेट करने की सुविधा थी। सन् 1890 ई. तक अमेरिका समेत कई देशों में रंग-बिरंगे ब्लॉक अखबार छपने लगे। सन् 1900 ई. तक बिजली संचालित रोटरी प्रेस, लिनोटाइप की सुविधा भी आने लगे और आज तो हम ऐसे टेक्नोलॉजी मैं पहुंच चुके हैं जहां अनेकों प्रकार की कंप्यूटराइज्ड ऑफसेट मशीनों का निर्माण हो चुका है जो एक बहुत ही बेहतरीन क्वालिटी की प्रिंटिंग देने में सक्षम है प्रिंटिंग के क्षेत्र में बहुत बड़ी क्रांति आ चुकी है जिसमें एक साथ रंग-बिरंगे मल्टी कलर छपाई बेहतरीन और उच्च स्तर की होने लगी है जो प्रिंटिंग के क्षेत्र को बदलकर रख दिया है।

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