बद्रीनाथ धाम का रहस्य | Secret of Badrinath Dham

बद्रीनाथ, भगवान विष्णु के 108 दिव्य अवतारों में से वैष्णवों के लिए पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। बद्रीनाथ शहर, बद्रीनाथ मंदिर के साथ-साथ योग ध्यान बदरी, भव्य बद्री, आदि बद्री और वृद्धा बद्री सहित पंच बद्री मंदिरों का हिस्सा है। अलकनंदा नदी के बांई और तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित भगवान विष्णु के इस धाम के आस-पास एक समय में जंगली बेरी बद्री प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी। इसी बद्री के नाम पर इस धाम का नाम बद्रीनाथ पड़ा। वहीं बद्रीनाथ नाम होने के पिछे एक कथा भी प्रचलित है हुआ यूं कि भगवान विष्णु तपस्या में लीन थे कि भयंकर हिमपात होने लगा। हिमपात के कारण भगवान विष्णु भी पूरी तरह हिम में डूब चुके थे। तब माता लक्ष्मी से उनकी यह दशा सहन न हो सकी और उनके समीप ही एक बेरी यानि बदरी के वृक्ष का रुप लेकर उन्हें वर्षा और हिम से बचाने लगी। कालांतर में जब भगवान विष्णु ने आंखे खोली तो देखा की मां लक्ष्मी स्वयं हिम से ढकी हुई हैं। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी के तप को देखते हुए कहा कि आपने भी मेरे समान ही तप किया है इसलिये इस धाम को मुझे तुम्हारे साथ पूजा जायेगा साथ ही उन्होंने कहा चूंकि आपने बदरी वृक्ष का रूप धारण कर मेरी रक्षा की है इसलिये मुझे भी बदरी के नाथ यानि बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा।

बद्रीनाथ धाम के कपाट सर्दियों के मौसम में बंद रहते हैं। कहते हैं मंदिर के कपाट बंद होने के बाद फिर छह मास तक देवर्षि नारद भगवान की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के कपाट बंद करते समय जो ज्योति जलाई जाति है वह कपाट खुलने के बाद भी वह जलती हुई मिलती है। बद्रीनाथ धाम पहले भगवान शिव का निवास होता था और वे यहां माता पार्वती के साथ रहा करते थे। एक बार की बात है कि भगवान शिव और माता पार्वती देखते हैं कि द्वार पर एक बालक बहुत तेज-तेज रो रहा है। माता पार्वती इस दारुण दृश्य को देखकर चुप न रह सकी और बच्चे की तरफ जाने लगी। भगवान शिव ने उन्हें रोकने की कोशिश भी की समझाया भी कि इस निर्जन इलाके में यह अकेला बच्चा जरुर कुछ गड़बड़ है। लेकिन बच्चे का रुदन माता पार्वती के हृदय को भेद रहा था वे बच्चे को उठाने लगी की भगवान भोलेनाथ ने फिर रोका और कहा कि पार्वती बच्चे को मत छुओ। इस माता पार्वती बिफर गई और बोली की आप इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं। लाख समझाने पर भी वे नहीं मानी और बच्चे को अंदर ले गई थोड़ी देर बाद बच्चा चुप हो गया। माता पार्वती बच्चे को दुध पिलाकर निश्चिंत हुई तो उसे छोड़कर भगवान शिव के साथ नजदीक के गरम पानी के झरने में स्नान करने चली गईं। जब वे वापस लौटे तो देखा कि घर अंदर से बंद है। ऐसे में माता पार्वती आश्चर्यचकित हुई और बोली ऐसा कैसे हुआ? भगवान शिव बोले मैनें पहले ही कहा था बच्चे को मत उठाओ वह कोई साधारण बालक नहीं लेकिन तुम नहीं मानी अब भुगतो। माता पार्वती बोली अब हम क्या करेंगें कहां जायेंगें तब भगवान शिव बोले यह तुम्हारा प्रिय बालक है इसलिये मैं इसे कोई हानि नहीं पंहुचा सकता अब हमारे पास एक ही विकल्प बचता है कि हम अपने लिये कोई और ठिकाना ढूंढ लें तब भगवान शंकर ने वहां से कूच कर केदारनाथ में अपना नया ठिकाना बनाया। आप सोच रहे होंगें की यह बालक कौन थे तो यह थे भगवान विष्णु जिन्हें अपनी साधना के लिये यह स्थान पसंद आया और बालक बनकर भगवान शिव के घर में अपना डेरा जमाया।

 

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