True Words सत्य वचन

नहि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं। 

अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मों सनन्तनो।।

इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होते, अ-वैर (मैत्री) से ही शांत होते हैं।

यही सदा का नियम है।

 

इध सोचति पेच्च सोचति पापकारी उभयत्थ सोचति।

सो सोचति सो वविहञ्ति दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो।।

इस लोक में शोक करता है और परलोक में जाकर भी पापी दोनों जगह शोक करता है।

वह अपने मैले कर्माे को देखकर शोक करता है पीड़ित होता है।

 

असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनो।

ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासंकप्पगोचरा।।

असार को सार और सार को असार समझने वाले मिथ्या संकल्प में पड़े वे सार को प्राप्त नहीं करते।

 

इध नन्दति पेच्च नन्दति कतपुञ् उभयत्थ नन्दति।

पुञां मे कतन्ति नन्दति भीय्यो नन्दति सुग्गतिं गतो।।

इस लोक में आनन्द करता है और परलोक में जाकर भी पूण्यात्मा दोनों जगह आनन्द करता है। ‘‘मैंने पूण्य किया है’’ सोच आनन्द करता है। सुगति को प्राप्त हो और भी अधिक आनन्द करता है।

 

यथा दण्डेन गोपालो गावो पाचेति गोचरं।

एवं जरा च मच्चू च आयुं पाचेन्ति पाणिनं।।

जैसे ग्वाला लाठी से गायों को चारागाह में ले जाता है वैसे हीं बुढापा और मृत्यु प्राणियों की आयु को ले जाते हैं।

 

संसार के सारे धर्मों में आपस में भले हीं विवाद हो किन्तु अहिंसा पर सभी धर्म एक है। सभी धर्मों ने मानसिक, कायिक और वाचिक हिंसा को त्याज्य बताया है।

पाप कर्म करते समय मूर्ख उसे नहीं बूझता है। किन्तु पीछे वह दुर्बुद्वि अपने हीं कर्मों के कारण आग से जले हुए के भांति अनुताप करता है।

 

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