दुर्गापूजा पर निबंध | Essay on Durgapuja

दुर्गापूजा हमारे देश के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह देश के प्रत्येक भाग में मनाया जाता है। लेकिन, कुछ राज्यों में यह बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल का तो यह मुख्य त्योहार है। यह त्योहार आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से दशमी तिथि तक मनायी जाती है। इस अवसर पर स्कूल, कॉलेज और सरकारी दफ्तर लम्बी अवधि के लिए बंद रहते हैं।

आश्विन माह में मनाये जानेवाले त्योहार को शारदीय नवरात्र कहा जाता है। यह त्योहार चैत्र माह में भी मनाया जाता है। चैत्र माह में मनाया जानेवाला त्योहार वसंत नवरात्र के रूप में मनाया जाता है। लेकिन, यह उतना प्रसिद्ध नहीं है, जितना कि शारदीय नवरात्र।

दुर्गापूजा दस दिनों तक मनाया जाता है। वास्तव में यह पर्व, प्रथम दिन से नौवें दिन तक मंत्रों का उच्चारण देवी दुर्गा के सम्मान में किया जाता है। लोग मंत्र पढ़ते हैं एवं देवी की शक्ति को याद करते हैं। दसवाँ दिन पूर्णाहूति का दिन होता है। इस अवसर पर देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसकी स्थापना सातवें दिन की जाती है। अन्तिम दिन पूजा बड़े उत्साह के साथ मनायी जाती है। प्रतिमाएँ बहुत सारे मुद्राओं की होती हैं। उन्हें सुन्दर वस्त्र पहनाये जाते हैं। देवी दुर्गा के दस हाथ होते हैं, जिनमें विभिन्न तरह के अस्त्र धारण किये रहती हैं। पूजा की अवधि में लोगों के बीच प्रसाद वितरण किया जाता है। लोग पूजा स्थल के पास जमा होते हैं एवं देवी का दर्शन करते हैं। 

दुर्गापूजा एक धार्मिक त्योहार है। यह देवी दुर्गा के सम्मान में मनाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह बड़े उत्साह से मनाया जाता है। लोग नये वस्त्र पहनते हैं तथा त्योहार का आनन्द लेते हैं। इसका आनन्द सभी उम्र के लोग उठाते हैं। खासकर बच्चों की खशी की तो सीमा नहीं होती।

राम और रावण की कहानी

दुर्गापूजा पर निबंध | Essay on Durgapuja

भगवान् राम के वनवास के दिनों में रावण छल से सीता को हरकर ले गया था। राम ने हनुमान और सुग्रीव की सहायता से लंका पर आक्रमण किया। उसके बाद भयानक युद्ध हुआ जिसमें भगवान् राम और उनके अनुयायियों ने लंका की ईंट से ईंट बजा दी। कुम्भकर्ण, मेघनाद तथा रावण को मार कर लंका पर विजय पाई।

विजयदशमी का त्योहार पाप पर पुण्य, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। भगवान् राम ने अत्याचारी और दुराचारी रावण को मार कर भारतीय संस्कृति की रक्षा की थी। ऐसे त्योहार हमारी वीरता को जगाते है और हमें अच्छे मार्ग पर चलने को प्रेरित करते हैं।

दशहरा हमें अनेक प्रकार की शिक्षा देता है। इससे रामचन्द्र जी के समान पितृभक्त, लक्ष्मण के समान भ्रातृ-भाव, सीता के समान पतिव्रता और धैर्यवान् तथा हनुमान के समान स्वामिभक्त बनने की प्रेरणा मिलती है।

दशहरा रामलीला का अन्तिम दिन होता है। भिन्न-भिन्न स्थानों में अलग-अलग प्रकार से यह दिन मनाया जाता है। बड़े बडे नगरों में रामायण के पात्रों की झांकियां निकाली जाती हैं। रामायण का पाठ किया जाता है। दशहरे के दिन रावण, कुम्भकर्ण तथा मेघनाद के पुतले बनाए जाते हैं। सायंकाल के समय राम और रावण के दलों में कृत्रिम लड़ाई होती है, पटाखे आदि छोड़ें जाते हैं। 

वर्तमान में दशहरे का बदलता स्वरूप

आज दशहरे का स्वरूप इतना बदल गया है कि, हम त्योहार के अपनी वास्तविकता से अलग होकर एक आधुनिक युग के तरफ प्रवेश कर रहें हैं। जिससे इसके महत्व को काफी हद तक कम कर दिया हैं।

दशहरे पर एक दुसरे के घर जाकर, एक दूसरे के साथ मिठाईयाँ बांटना, एक दूसरे के साथ खुशियाँ मनाना, एक दूसरे से गले मिलना ये रिवाज अब एक इलेक्ट्रॉनिक रूप ले चुका है जैसे- मोबाइल कॉल एवम इंटरनेट मेसेज से हम एक दूसरे को विश करते हैं। इस प्रकार आधुनिकरण के कारण त्योहारों का रूप बदलता जा रहा हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »
Scroll to Top