शवासन | Shavasan

इस आसन में शरीर की स्थिति मुर्दे के समान हाती है अंग-अंग ढ़ीला छोड़कर शरीर और मस्तिष्क को इसमें पूर्णतः विश्राम की स्थिति में लाया जाता है।

विधि-

भूमि पर दरी या कम्बल बिछा कर पीठ के बल चित बैठ जाइए। दोनों पैर फैले हुए हों और उनमें एक फीट की दूरी हो पैर ढ़ीला छोड़ने पर जिधर लुढ़कते हैं, लुढ़कने दीजिए। बाहों को दोनों बगल में शरीर से थोड़ा हटाकर फैलाएँ और हाथों को ढ़ीला छोड़ दें।
हथेली ऊपर की ओर हों और उँगलियाँ ढ़ीली छोड़ने पर जैसे रहें, वैसे ही रहने दीजिए। इसके बाद स्वाभाविक गति से साँस लेते रहिए। आँखे बंद करके ढ़ीली छोड़ दें।

ध्यान-

श्वासन की अवस्था में मस्तिष्क के विचारों को शान्त करने का पयत्न करें। किसी प्रफुल्लित करने वाली वस्तु पर चेतना एकाग्रचित करें, जिसमें काम सम्बन्धी कोई भाव नहीं हो। इस आसन में ‘ध्यान’ लगाने से एक समय ऐसा आयेगा, जब शरीर हल्का फुल्का लगेगा और चेतना उन्मुक्त सी लगेगी।

लाभ-

यह शरीर को पूर्णतया विश्राम प्रदान करता है। इससे थकावट दूर होती हैं। मानसिक तनाव दूर होता है। मन-मस्तिष्क हल्का एवं प्रफुल्लित होता है।

सावधानियाँः

  1. शवासन में ध्यान लगाते समय शरीर और मस्तिष्क पर कोई भी दबाव न डालें। ‘ध्यान’ में भी स्वाभाविक रूप से एकाग्रचित्तता को प्राप्त करने का प्रयत्न करें।
  2. उत्तर दिशा की ओर सिर करके शवासन न लगाएँ। अच्छा हो कि सिर पूरब दिशा में रखें।
  3. शवासन करवट लेटकर भी किया जा सकता है, लेकिन सबसे लाभप्रद चित लेटना ही है।

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