सुखासन | Sukhasana

सुखासन का अर्थ है, ‘वही आसन, जिसमें बैठने से सुख मिले। स्पष्ट है कि यह आसन आराम से बैठने का आसन है और सरल है।

विधि

सुखासन एक सरल आसन है। इस मुद्रा में हम दैनिक जीवन में अक्सर बैठते है, किन्तु हम उसे सुखासन नही कह सकते। कारण यह है कि हम मुद्रा तो वह बना लेते हैं किन्तु इसके नियमों का सूक्ष्मता से पालन नहीं करते।
सुखासन के लिए एक दरी या कम्बल भूमि पर बिछाएँ। घुटनों को मोड़ कर पालथी मारकर बैठ जाएँ। हाथों को आगे स्वाभाविक रूप से ढ़ीला छोड़ दें। हाथ घुटनों पर भी रखा जा सकता है, पर ढ़ीला हो। कमर, पीठ, रीढ़, गर्दन सीधी रखें। अपनी पेशियों पर कोई दबाव न दें। जैसे आराम मिलता हो, बैठें।

ध्यान –

सुखासन में सभी ध्यान कियाएँ की जा सकती है, जो पद्मासन में की जाती हैं। त्रटक के अभ्यास के लिए प्रारम्भ में इसी आसन का प्रयोग उचित है।

लाभ –

बैठकर करने वाले किसी कार्य के लिए यही आसन, उपयुक्त है। इसमें बैठने से थकावट नहीं होता। मरुदंड सीधा होता है। कमर, मेरु आदि में लचीलापन आता है।

सावधानियाँ –

उत्तर दिशा की ओर मुँह करके न बैठें। पेशियों को ढ़ीला रखें। कमर, पीठ, रीढ़, गर्दन को सीधा रखें। सुखासन में ‘ध्यान’ लगाते समय पहले मस्तिष्क को भी स्वतन्त्र छोड़ दें, ताकि विचारों की धारा का शमन हो सके।

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