छठ महापर्व के बारे में जाने रोचक तथ्य | Interesting facts about Chhath Mahaparva

छठ पर्व पग-पग शुद्धता एवं पवित्रता का निर्वाह करते हुए लगभग 72 घंटों की कठोर तपस्या के उपरांत उसे सम्पन्न किया जाता है। लोगोें की मान्यता है कि छठ व्रत को निष्ठा पूर्वक करने से संतान की प्राप्ति, पारिवारिक एवं शारीरिक सुख-शांति, असाध्य रोगों से मुक्ति, धन-धान्य की प्राप्ति मिलती है। छठ सूर्य उपासना का पर्व है। इस पर्व का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से प्रारंभ होता है। छठ पर्व के विषय में प्रचलित अनेक कथाओं में एक कथा ‘देवी भागवत पुराण’ में वर्णित है। जो निम्नवत है।
राजा प्रियवत स्वायुभुष मुनि के पु़त्र थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। विवाह के लम्बे अंतराल पर एक पु़त्र भी हुआ तो वह मृत उत्पन्न हुआ। राजा शिशु के शव को लेकर शमशान पहुंचे एवं उसे हृदय से लगाकर रोने लगे। उनका शोक यहां तक बढ़ा कि वे प्राण त्यागने को भी तत्पर हो गये। तभी उन्हें ऐसा लगा की देवी पूजा करनी चाहिए फिर उन्हनो देवी की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर देवी ने कहा राजन, मैं बह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना हूं। मेरे पिता ने मेरा विवाह हरगौरी पुत्र स्वामी कार्तिकेय से की। मैं सभी मातृकाओं में विख्यात सकन्ध पत्नी हूं।
मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कही जाती हूं। यह कहते हुए देवी ने मृत शिशु को पुनर्जीवित कर राजा को सौंपा और अन्तध्र्यान हो गई। यह घटना शुक्लपक्ष की षष्ठी के दिन की है। अतः इसी दिन से षष्ठी देवी की पूजा होने लगी। इस कथा से इस प्रश्न का समाधान भी हो जाता है कि सूर्य की अराधना के इस पर्व को छठी मईया की पूजा नाम से क्यों जाना जाता है।
इस व्रत का संबंध पौराणिक काल से है। इस पर्व का संबंध शिव-पार्वती के कनिष्ठ पुत्र कार्तिकेय से भी जुड़ा हुआ है। इस पर्व को हम स्कन्ध षष्ठी के नाम से भी जानते है। बिहार के अलावा यह पर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, दिल्ली, मुम्बई आदि प्रदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है। चार दिनों तक मनाया जानेवाला यह पर्व धर्म, निष्ठा एवं पवित्रता के साथ मनाया जाता है। वैसे तो इस पर्व को मुख्य रूप से स्त्रियां ही करती है पर पुरूष व्रतधारियों की संख्या भी कम नहीं होती। इस व्रत की इतनी महत्ता है कि इसे अन्य धर्मावलम्बी भी निष्ठापूर्वक मन्नत मानते हुए करते है। विशेषतया मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग भी यह व्रत करते हुए पाये जाते हैं। वर्ष में यह पर्व दो बार मनाया जाता है। एक चैतमास के शुक्लपक्ष में जो चैती छठ के नाम से जाता जाता है और दूसरा कार्तिक छठ, जो कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में मनाया जाता है, लेकिन चैती छठ से ज्यादा लोग कार्तिकी छठ ही करते हैं। इस पर्व को करनेवाली महिलाएं पर्व पड़ने वाले माह में यथा संभव प्रतिदिन गंगाजल से स्नान करती हैं।
इस पर्व को कही ‘सूर्य षष्ठी’ तो कहीं ‘डाला छठ’ कहा जाता है। इस पर्व के शुरू में प्रथम दिन नहाय-खाय, अगले दिन रात में खरना या इसे लोहण्डा, होता है। उसके बाद शाम का अर्ग तथा सुबह को भी देते हैं। पर्व के समय में ही लोग अपने परिजन एवं मित्रों में प्रसाद बांटने को भी पुनीत कर्तव्य समझते हैं।

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