जीवन जीने की चाह | Wish to Live Life

मानवतावाद के अधीन ज्लवंत समस्याओं और चुनौतियों के कारण समाज, समूह, कार्यक्षेत्र, प्रदेश, राष्ट्र और विश्व किसी न किसी रूप से अधिकाधिक प्रभावित है। हर क्षेत्र किसी न किसी समस्या से घिरा है। इस सृष्टि में उत्पन्न संपूर्ण जीवों का कर्म प्रकृति की सेवा मात्र ही तो है किन्तु वर्तमान परिवेश और परिस्थितियां विभिन्न प्रकार की समस्याए उत्त्पन्न कर रही है। प्रकृति के विपरीत किये गई कर्म संपूर्ण सृष्टि के लिए विध्वंसकारी हैं। प्रकृति के क्रियाकलापों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हमें कर्म दोषों पर विचार करके उन बाधाओं को दूर करना होगा ताकि सुख, समृद्धि, वैभव, मर्यादा, शक्ति जैसे अमूल्य उपलब्धियां संपूर्ण मानववाद को मिल सके।
यहाँ हमारे द्वारा प्रकृति के विरुद्ध किये गये अनैतिक आचरणों के कारण पहले तो प्रकृति दूषित हुई और फिर वो हमें दूषित कर रही है। जिसके कारण हमारी सीमाएं संकुचित हो रही है, हमारी क्षमताएं घटती जा रही है चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो। कुछ उदाहरणों द्वारा इसे समझा जा सकता है। शास्त्रों में वर्णित सतयुग की हमारी उम्र सीमा अब हजारों वर्ष थी जो अब घटकर 100 या फिर उससे भी कम रह गई है और लगातार घटती ही जा रही है। स्त्रियों और पुरुषों में समान रूप से प्रजनन क्षमता का ह्रास हुआ है। अपनी आध्यात्मिक सत्ता को हमने तहस नहस कर रखा है। सतयुग में लोग स्वस्थ और पूर्णत्व को प्राप्त होकर अपने सर्वांगीण विकास (आध्यात्मिक) में सफल होते थे पर हमारी क्षमताएं लगातार घटती जा रही है। व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक रूप से हम पतन के रास्ते पर हैं। ना तो हम अपना स्थूल विकास कर पा रहें हैं और ना सूक्ष्म विकास की तरफ अग्रसर हैं। कारण क्या है इसकी छानबीन आवश्यक है।
सभी जानते हैं प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुंध दोहन हुआ है। मानवीय महत्वकांक्षा की चपेट में आकर जीव जंतुओं की अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी है और कई विलुप्ति की कगार पर हैं। पूरे विश्व में जंगलों का प्रतिशत काफी कम रह गया है जिसके करण प्राकृतिक संकटों के बादल गहराते चले गए हैं। पर्यावरण संकट, मौसम के संकट, भांति-भांति की बीमारियाँ, महामारियां, आपदाएं, इंसानी जिंदगी को दबोचने की तैयारी में हर वक्त लगी रहती है। उत्तराखंड की त्रासदी मानवीय दोहन का ही परिणाम है। स्वार्थ लिप्सा से ग्रसित इस अहंकारी मानव को मनोरोगों ने धर पटका है।
प्रकृति ने जीवनधारियों के निर्वाह की सुविधा स्वेक्षा पूर्वक प्रदान की है। ऐसा न होता तो जीवन के लिए अपना आस्तित्व बनाए रखना, अपनी प्रगति के साधन सामग्री उपलब्ध कर सकना ही संभव नहीं होता। तब उन्नति करने और समग्र समर्थ होने की बात कैसे बनती? इतने पर भी यह मानकर चलना होगा कि जीवधारियों का अपना निजी स्वभाव अग्रगमन के लिए, अभ्युदय के लिए अनवरत प्रयास करना है। इसी को इच्छा, आकांक्षा और अभिलाषा कहते हैं।
मनुष्य इस सृष्टि के आरंभ की तुलना में असंख्य गुना अधिक परिष्कृत हैं। आदिमकाल की उन्गढ़ स्थिति और आज की स्थिति का कोई मुकाबला नहीं है। प्रकृति की दिशा में जब उसके चरण आगे बढ़े तब उसने कृषि पशुपालन जैसे उद्योग सीखे। वस्त्र, निवास, अग्नि, प्रल्वन जैसी विधि व्यवस्थाओं से अवगत हो गया। बोलना, लिखना, सीख गया तथा अपने अपने समुदायों के प्रथा प्रचलनों का अभ्यस्त हो गया। भौतिक प्रगति इसी दिशा में प्रगतिशील होती चली गई। विज्ञान, यंत्रीकरण, अर्थशास्त्र, शासनतंत्र के सहारे वह काफी आगे जा चुका है पर सभी प्रकार की उन्नति के बावजूद प्रकृति परायणता की भावना अपने निम्नतम स्तर पर है। जीवधारी सिर्फ अपने लिए जी रहे हैं वे सिर्फ भौतिक सुखो की पूर्ति में संलग्न हैं और प्रकृति का बड़ी तेजी से दोहन कर रहे हैं और दुष्प्रभावों की चर्चा हम कर चुके हैं।
हम मनुष्य ईश्वरीय गुणों को प्राप्त कर सकते हैं, उन दुष्प्रभावों से बच सकते हैं जो हमारे द्वारा प्रकृति के विरुद्ध किये गए अनैतिक आचरणों के कारण उत्पन्न हुए हैं। ईश्वर, प्रकृति और जीव ये तीनों अनादि हैं। हम सब ईश्वर की संतान हैं एवं प्रकृति हमारी माँ हैं। हमें इसकी रक्षा करनी चाहिए। इस कार्य (पंचमहाभूतों को परिष्कृत करने) का सबसे अच्छा साधन धरती पर फैले वनक्षेत्र ही हैं जो सभी तरह से उन पंचतत्वों को शोधित करते रहते हैं। इस तथ्य का संपूर्ण वैज्ञानिक आधार भी है। अतः हमें उनके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए हर संभव प्रयास करना है। हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे क्योंकि पेड़ लगाने से ही धरती पर हो रहे प्रदूषण को कम किया जा सकता है और यह धरती हम जीवों के रहने लायक बनी रहेगी। इसके लिए हमें अपने आस-पास से शुरुआत करनी होगी। इस कार्य को करने के लिए हम दृढ़ संकल्पित हैं।

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