ध्रुवासन | Dhruvasana

कहा जाता है कि प्रसिद्ध प्रभुभक्त ‘ध्रुव’ ने इसी आसन को लगाकर तपस्या की, इसलिए इस आसन को ध्रुवासन कहा जाता है।

विधि-

भूमि पर आसन बिछाकर सीधे खड़े हो जाइए। खड़े होने पर आपकी स्थिति ‘सावधान’ की मुद्रा में होनी चाहिए। दाई टाँग को नंग-मूल में सटा लीजिए। दोनों हाथों को जोड़कर प्रणाम की मुद्रा में लाएँ और उसे हृदय के पास ऊपर लगाइए।
साँस की गति सामान्य रखें। जितनी देर तक मुद्रा में रह सकते हैं रहे। कुछ देर तक आराम कीजिए। फिर टाँगों को बदलकर आसन लगाइए।

ध्यान-

ध्रुवासन में त्रटक बिन्दु पर ध्यान लगाकर चेतना को केन्द्रित किया जाता है।

लाभ-

यह मानसिक एकाग्रता प्राप्त करने का आसन है। छात्र-छात्रओं के लिए यह आसन अत्यन्त उपयुक्त है, क्योंकि इससे स्मरण-शक्ति का विकास होता हैं और आलस्य दूर भागता है।

सावधानियाँ-

  1.  पूर्व दिशा की ओर मुँह करके यह आसन लगाएँ ।
  2.  टाँगों को मोड़ने का अभ्यास धैर्यपूर्वकर करें।
  3.  प्रदूषित वायु वाले स्थान पर आसन न लगाएँ।

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