योगासन सीखें | Learn yoga

योगासनों के द्वारा आपका शरीर सदैव स्वस्थ रह सकता है। योगासन आपके स्वास्थ्य पर होने वाले प्रत्येक बिमारी से आक्रमण का मुकाबला करते हैं। दीर्घायू जीवन तभी प्राप्त होता है, जब शरीर लंबे समय तक साथ दें, और शरीर तभी साथ दे सकता है जब आप योगासन और प्राणायाम लगातार करते रहें।
योगासनों के करने से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है, जिससे योगासनों का अधिक से अधिक लाभ मिल सके और अज्ञानता के कारण होने वाली भूलों के कारण किसी भी दुष्परिणाम से बचा जा सके।

योगासनों से पूर्व सावधानियाँ

  • जो आसन स्त्रियों के लिए वर्जित कहे गये हैं, उन्हें वे न करें। गर्भावस्था तथा रजस्वला होने के समय में भी आसनों को न करें।
  • कठिन आसन, प्राणायाम तथा सूक्ष्म यौगिक क्रियायें प्रारम्भिक काल में किसी जानकार व्यक्ति के निर्देशन में ही करनी चाहिए, अन्यथा लाभ के बजाय हानि उठानी पड़ सकती है।
  • केवल एकमात्र आसन वज्रासन ही भोजन के पश्चात् भी किया जा सकता है। अन्य सभी आसन भोजन के पश्चात् करना वर्जित माने गये हैं। खाली पेट योगासन करना सर्वोत्तम है। योगासनों से पूर्व व पश्चात् एकदम कुछ भी नहीं खाना चाहिए। जो भी खाये डेढ़-दो घंटे के बाद ही खायें।
  • योगासनों का मुख्य उद्देश्य शरीर के मल को बाहर निकालकर शरीर को स्वस्थ रखना है। स्वस्थ शरीर की यही निशानी है कि शरीर का मल-मुत्र स्वाभाविक समय पर बिना किसी कठिनाई के विसर्जन हो और शरीर में क्रियाशीलता बनी रहे।
  • योगासनों का अभ्यास करने से धीरे-धीरे कोष्ठबद्धता दूर हो जाती है। आसन आरम्भ करने से पूर्व शौचादि से निवृत होकर पेट को पूरी तरह साफ कर लेना चाहिए।
  • चाय या दूध पीने के तुरन्त बाद भी कोई व्यायाम या आसन न करें। कम से कम दो घंटे का अंतराल अवश्य रखें।
  • काफी समय तक ठंडे या गर्म स्थान अथवा सूर्य स्नान के तुरन्त पश्चात् योगासन करना हानिकारक होता है।
  • योगासन करने के बाद मूत्र त्याग करने से शरीर से गन्दे कीटाणु बाहर निकलते है। इससे पर्याप्त लाभ भी प्राप्त होता है।
  • आसनों को करने का लाभदायक और उपयुक्त समय सूर्योदय से आधा- एक घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय के बाद तक का एक घंटा उपयुक्त रहता है। वैसे भी योगासनों के लिए सूर्योदय या सायंकाल का समय ही उत्तम माना गया है।
  • प्रातःकाल या सायंकाल समयाभाव होने पर योगासन दिन में किसी भी समय किये जा सकते हैं। दिन में योगासन भोजन करने से एक-डेढ़ घंटा पहले या भेाजन करने के 3-4 घंटे बाद करें। सुबह खाली पेट योगासन करना सर्वश्रेष्ठ है।
  • आसन करने के पश्चात् एकदम स्नान न करें न ही ठंडी व तेज हवा में जायें । कम से कम आधा घंटा विश्राम करने के उपरान्त ही स्नान करें।
  • क्रोध या अत्यन्त शोक में भी आसन न करें। ऐसे समय में आसन करने से लाभ के बजाय हानि ही होगी। आसन करते समय बुरे विचार व मानसिक तनाव से भी बचना आवश्यक है।
  • आसन करते समय साँस सदैव नाक से ही लेनी चाहिए। साँस को पेट तक पहुँचाना आवश्यक है। साँस लेते समय गहरे-गहरे साँस लेने चाहिए जिससे पेट फूलता-सिकुड़ता मालूम पड़े।
  • योगासन कभी भी जल्दबाजी में न करें। जब आपके पास पूर्ण रूप से योगासन करने के लिए पर्याप्त समय हो तभी योगासन करें। योगासनों को धीरे-धीरे विधिपूर्वक पूरा समय देकर ही सम्पत्र करें। क्योंकि इससे लाभ प्राप्त होता है।
  • योगासन करते समय शरीर के साथ जोर-जबरदस्ती बिल्कूल न करें। अपनी सामर्थ्यानुसार ही करें। कुछ आसन कठिन होते हैं अथवा सरल आसनों में भी अंगो को सीधा रख पाना कठिन होता है। ऐसे में बल प्रयोग या अधीरता न दिखाएँ । इसलिए धैर्यपूर्वक अभ्यास करें। पूर्णरूप से सही स्थिति धीरे-धीरे-ही प्राप्त होती है, कुछ दिनों के अभ्यास से लोच व सामर्थ्य उत्पन्न होते ही आसन पूर्ण स्थिति में लगने लगेंगे। जल्दबाजी या जोर-जबरदस्ती से हानि हो सकती है।
  • योगासनों से 5-10 मिनट पूर्व एक-डेढ़ गिलास (प्रातः खाली पेट) ताजा जल पी लेने से योगसन करने से पानी भली प्रकार आंतों में घूमता हुआ नीचे पहुँच जाता है। जिससे कब्ज की शिकायत व जोड़ो में जो जल जमा हो जाते हैं उनमे बहुत लाभ होता है। क्योंकि पानी पीने से ये मल-मूत्र व पसीने के रास्ते शरीर से बाहर निकलना आरम्भ हो जाते है।
  • योगासन करते समय हँसे या बोलें नहीं। श्वास-प्रश्वास तथा श्वांस रोकने की क्रिया आसनों में बताये गये निर्देशानुसार ही करें। आसन करते समय हँसने से मसल पुल होने का खतरा रहता है।
  • शरीर में कोई चोट लगी होने पर सूजन, खुजली या किसी भी प्रकार की एलर्जी होने पर आसन न करें।
  • खांसी आदि रोग से ग्रस्त होने पर पेट, पेडू, नाभि आदि पर विशेष जोर डालने वाले योगासन न करें। क्योंकि योगासन करते समय अचानक उत्पन्न खांसी का दौरा, मांसपेशियों व नाड़ीतंत्र पर अतिरिक्त जोर नाजुक स्थिति में कोई उपद्रव कर सकता है। इसी प्रकार ”दय पर जोर (दबाव) डालने वाले आसनों को करते समय पूर्ण सावधानी बरतनी चाहिए।
  • आसन सदैव खुली, हवादार, छायादार, समतल फर्श अथवा तखत पर ही करें। आसन करने के लिए दरी, चटाई या कम्बल बिछाएँ। सर्दियों में दरी पर कम्बल बिछा सकते हैं तथा ऐसे स्थान का प्रयोग करना चाहिए जहाँ सीधी हवा न लगे। उबड़-खाबड़ या नंगी भूमि पर आसन न करें। घर की छत या बगीचा आसन के लिए उपयुक्त स्थान है।
  • योगासनों को करते समय कमर के नीचे अण्डरवियर (जंघिया) पहनना उत्तम रहता है।, लंगोट पहनना अधिक उत्तम नहीं, क्योंकि इससे पेट व पेडू कस जाता है, जिससे रक्त संचार में बाधा पड़ती है तथा बाकी का शरीर नग्न रहना चाहिए। इसके अनुसार हल्के और खुले वस्त्र पहने जा सकते हैं। योगासनों को करते समय स्त्रियों को अपने केश ठीक प्रकार से बाँधकर रखने चाहिए तथा घड़ी, अंगूठी, चेन आदि आभूषण उतार देने चाहिए।
  • आसन सदा स्वच्छ व शांत वातावरण में ही करें। दो समय की आवश्यकता नही। योगासन एकांत में ही करें। सीखने के लिए कक्षा या समूह में सीख सकते हैं। समूह में करने से ज्यादा लाभ नहीं होगा।
  • योगासन को आरम्भ करने से पूर्व प्राणायाम या शवासन द्वारा साँसो को व्यवस्थित तथा स्वाभाविक गति में ले आना तथा शरीर को मांसपेशियों को विश्राम देना उचित रहता है। योगासनों की समाप्ति पर शवासन कर लेना स्वास्थ के लिए भी उत्तम रहता है।
  • आसनों को करते समय उनका क्रम इस प्रकार अभ्यास करने से संतुलन बना रहता है और लोच बढ़ने की क्रिया में तेजी आती है।
  • प्राणायाम व ध्यान आदि क्रियाएँ सदैव रीढ़ की हड्डी सीधी रखने वाले तथा घुटने मुड़े रहने वाले आसनों (सिद्धासन, पद्मासन आदि) में ही करना चाहिए। वह भी ‘मूलबन्ध’ लगाये हुए। लेटकर या अधलेटे होकर प्राणायाम या ध्यान करना तथा मूलबन्ध लगाए बिना करना हानिकारक है।
  • योगासन का पूर्ण रूप से लाभ लेने के लिए मांसाहार व किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ का त्याग कर देना ही विशेष लाभप्रद है। क्योंकि आरोग्यता व प्राकृतिक दृष्टि से भी शाकाहार ही सर्वश्रेष्ठ है।

‘योगाभ्यास’ में ‘आसन’ शरीर की विभित्र मुद्राओं में बनाई गई विशिष्ट मुद्रा को कहते हैं। योग साधना में आसनों का अभ्यास मांसपेशियों, रक्त इन्द्रियों, रोमकूपों आदि के विकारों को दूर करने एवं शरीर क्रिया का स्वस्थ रहना एवं पेशियों का लचीला होना ‘ध्यान’ की एकाग्रता में अत्यन्त सहायक होता है। स्वाभाविक है कि यदि इसे व्यायाम के रूप में अपनाया जाए तो सभी प्रकार के रोगों को दूर करने में सहायक होता है।
लेकिन यह सदा स्मरण रखें कि ‘योग साधना’ का उद्देश्य उस चेतना की शुद्धि एवं शक्ति का विकास करना है, जो शरीर ही नहीं मन का भी संचालक है। सभी प्रकार की बिमारियों की जड़ मन की विकृति है। हमारे मन में यदि निराशा है, तो हमारा रक्तचाप गिर जाएगा, पेट में कब्ज हो जाएगी, अपच की शिकायत हो जाएगी, गैस बनेगी, सर के बाल झड़ेंगे या सफेद होने लगेंगे, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ जाएँगी, आँखों के नीचे काली छाया उभर जाएगी। इसी प्रकार क्रोध में हमारा रक्तचाप बढ़ जाता है नेत्र के तन्तु प्रभावित होते हैं। मस्तिष्क की नाड़ियाँ फुलने-पिचकने लगती हैं। इससे इनकी स्वाभाविक स्थिति में परिवर्तन हो जाता है। क्रोध से रक्त में विषाक्त तत्व (सोरा आदि) उत्पन्न होते हैं। इससे रक्त दूषित होता है। अनेक प्रकार की बीमारियाँ रक्त के दूषित होने से उसे अपनी गिरफ्रत में ले लेती हैं।

यदि मन की शुद्धि नहीं हुई, तो शरीर में विषाक्त तत्वों बनते रहेंगे। आप उसे व्यायाम के द्वारा ठेलकर बाहर निकालते रहेंगे। व्यर्थ ही जीवन भर श्रम करते रहना होगा। इसमें आपको मानसिक शान्ति, उत्साह, उल्लास आदि केवल आसन के अभ्यास से नहीं मिल पाएगा। मस्तिष्क का क्षेत्र ‘ध्यान’ का है। ध्यान लगाकर ही आप शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता को प्राप्त कर सकते हैं। सांसारिक मामलों की सफलता में भी यह आपको सहायता देगा।
योगाभ्यास के हम यहाँ आवश्यक सभी आसनों का विवरण दे रहे हैं।

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सरल आसन सीखें | Learn Simple Postures

शवासन
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ब्रहांजलि
पद्मासन
वज्रासन
योगमुद्रा आसन
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शशांकासन
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मकरासन
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सिंहासन
पवन मुक्तासन
उत्तानपादासन
नाभिकादर्शनासन
ध्रवासन
उत्काटसन

Twelve Jyotirlinga of Lord Shiva भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग

कठिन आसन सीखें | Learns Hard Postures
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बद्ध-पद्मासन योगमुद्रा
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उर्ध्व पद्मासन

प्राणायाम सीखें | Learn Pranayama

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