विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला जाने रोचक बातें | Fascinating things to visit world famous Sonepur fair

विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला ऐतिहासिक क्षेत्र का महात्मय और अतीत रहा है जिसका उल्लेख पुराणों एवं अन्य वैदिक वांड्मयों में किया गया है, विश्व की प्राचीनतम शास्त्र ऋगवेद में भारतवर्ष के महत्वपूर्ण और पवित्र नदियों के साथ सदानीरा नदी का भी उल्लेख मिलता है, जिसे शालिग्रामी नारायणी एवं वर्तमान में गण्डक नदी के नाम से हम जानते है, गंगा एवं गण्डक के पवित्र संगम पर स्थित वर्तमान के हाजीपुर एवं सोनपुर के क्षेत्र ही हरिहर क्षेत्र मेला एवं छत्तर मेला के नाम से प्रचलित है, जो आजकल सोनपुर मेला के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार इस पावन भुमि पर साक्षात हरि अर्थात विष्णु एवं हर अर्थात महादेव का अवतरण हुआ था, इस कारण इस क्षेत्र को पावन क्षेत्र समझा जाता रहा है, भक्त वत्सल श्री हरि ने लोक प्रसिद्ध गज-ग्राह के संघर्ष में अपने भक्त गज की करूण पुकार पर अवतरित होकर उसके प्राणों की रक्षा की थी।

वाल्मीकि रामायण एवं विभिन्न बौद्ध ग्रंथों में भी इस क्षेत्र की महत्ता का वर्णन है, कतिपय विद्वानों का मत है कि रावण के पिता विशेश्रेवा और पितामह पुलत्रय मुनि भी सोनपुर क्षेत्र में कभी रहते थे, यह क्षेत्र आरंभ से शैव, वैष्णव एवं शाक्त मतों का संगम-स्थल रहा है, इसके साथ ही यह क्षेत्र पौराणिक ऋषियों यथा जदुभरत, महर्षि पुलस्तय जैसे तपस्यियों की तपोभूमि भी रही है।

यह क्षेत्र मर्यादा पुरूषोतम राम, बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य जैसे महापुरूषों की चरण भूमि से भी पवित्र हुई है। अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण छठी सदी ई0 पूर्व में तात्कालिक दो शासन-तत्रों क्रमशः वज्जि गणतंत्र एवं कौशल के राजतंत्र का भी संगम स्थल रहा है। यह क्षेत्र विभिन्न धर्म, मतावलंबियों की विचारो से प्राचीन काल से ही आच्छादित रही है इसी विविधता से इस क्षेत्र का और विशिष्ट बना दिया है, यही विशिष्टता यहां की शक्ति भी रही है और इसी शक्ति ने वर्पकार एवं कौटिल्य जैसे महान कुटनीतिज्ञों को इस धरती को नमन करने को बाध्य कर दिया।

इसी प्रकार हरिहर क्षेत्र में अति प्राचीन काल से ही कार्तिक पूर्णिमा का मेला लगता जा रहा है, प्रारंभ में मेला वर्तमान के हाजीपुर क्षेत्र में ही लगता था, सोनपुर में इस तिथि को केवल शिव जी का जलाभिषेक किया जाता था, मेले की सम्पूर्ण गतिविधियाँ हाजीपुर शहर में ही सम्पन्न होती थी, सोनपुर को जोड़ने वाली लोहे का पुल जो गण्डक नदी पर है।

उसकी नींव 11 जनवरी 1885 ई0 में सर रीजरसटामसन साहेब बहादुर गर्वनर ने डाली थी और मार्च 1887 ई0 में लार्ड उफरीन साहेब वाईसराय हिन्द ने आकर पुल खोला था यों कहिए उन्होंने ही शुभारम्भ किया।
मेला तो हाजीपुर में लगता था सोनपुर तो धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र के रूप में शुरू से जाना जाता था, लेकिन 1837 ई0 में गण्डक नदी जो कोनहारा घाट से कोसो दक्षिण बहती थी, धीरे-धीरे हाजीपुर से सोनपुर की ओर सिमटती चली गयी और फिर आज पुरी तरह से हरिहर क्षेत्र मेला स्थल सोनपुर में सिमट कर रहा गया है।

हरिहरनाथ जी के मंदिर के परिसर में पटना के सूवा टिकारी की महारानी साहिबा नक ने कुछ और मकान साधुओं के ठहरने के लिए बनवाया और फिर लार्ड मारनिगटन साहेब के आदेश के बाद 1884 ई0 में मन्दिर कुछ और बढ़ा दिया गया।

विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला जाने रोचक बातें | Fascinating things to visit world famous Sonepur fairऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ मेला गज-ग्राह के लड़ाई के साथ ही शुरू हुआ होगा और जिसमें हाथी और अन्य पशु यथा- गाय, बैल, घोड़ा, ऊँट, बकरी आदि के आगमन का प्रारंभ हुआ होगा। जिसमें ब्रिटिश काल से ही एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माने जाने लगा।

आज भी अनेक प्रांतों के व्यापारी पशुओं की खरीद ब्रिक्री करने के लिए यहाँ आते है इसके साथ ही कई तरह के फिल्म एवं उद्योगों से सम्बन्धित कारीगर एवं उद्यमियों के लिए यह मेला आज भी आकर्षण का केन्द्र है। वर्तमान परिस्थिति में मेले ने आधुनिक रूप ग्रहण कर लिया, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा एवं सूचना तकनीक के विकास ने भी इस मेले के प्राचीन काल से चले आ रहे परम्परागत स्वरूप को बदल दिया है, लेकिन फिर भी काश्मीर से लेकर बंगाल तक के उद्यमी एक व्यापारी इस मेले में आज भी शिरकत करते है, इस मेले के विकास एवं संम्बद्र्धन के लिए राज्य सरकार ने भी बहुत कार्य किये हैं, लेकिन वर्तमान सदर्भ में यह कार्य संतोष जनक नहीं माना जा सकता है।

ब्रिटिश काल में मेले के दौरान यहां लगभग महीने भर कीर्तन एवं विभिन्न पंथों के साधु संतों का सत्संग एवं समागम चलता रहता था, स्थानीय लोक कलाकारों के बीच कीर्तन की प्रतियोगिता भी होती थी, फिर धीरे-धीरे यहां की सांस्कृतिक गतिविधियों में अनेक नामचीन कलाकारों ने भी अपने कला का प्रदर्शन किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यहां के सांस्कृतिक आयोजनों के स्वरूप बदलने लगे, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त कलाकारों ने भी अपने कला के प्रदर्शन से लोगों को अभिभूत किया है।जिनके स्थानीय कलाकारों के साथ विभिन्न विधाओं के प्रसिद्ध कलाकार गायन, वादन, एवं नृत्य की प्रस्तुति करते है, इसके साथ-साथ यहां पर लगे विभिन्न थियेटरों से पश्चिमी घुनों तथा उनकी तर्ज पर डिस्को गाने एवं डांस भी दिखने को मिलते हैं। 

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