विश्व में गणतंत्र की जननी वैशाली | Vaishali, the mother of the Republic in the world

गणतंत्र जननी वैशाली जो भारत के बिहार में पटना के बगल में है। वह वैशाली जिसने विश्व को मानवीय गरिमा, स्वतंत्रतामूलक सभ्यता और गणतंत्र से परिचित कराया, आज भी राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा प्राप्त से वंचित है। भारत सरकार के रहनुमाओं ने वैशाली से वादे करके भुला दिये।

वैशाली महज एक स्थान नहीं बल्कि एक उद्बोधन-प्रबोधन है। आज के संकटग्रस्त लोकतंत्र-गणतंत्र के लिए लैम्प पोस्ट है। वैदिक काल से लेकर मध्यकाल तक वैशाली ने सभ्यता के इतिहास में नए पन्ने जोड़े हैं। वैदिककाल में यह ऋषियों-मुनियों-देवों की तपोभूमि उल्काचेल के नाम से विख्यात रही तो परवर्ती काल में जैनधर्म के चैबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मभूमि तथा तथागत बुद्ध की कर्मभूमि बनी।

शतपथ ब्राह्मण के मुताबिक सरस्वती नदी के तटवर्ती राज्य के राजा विदेहमिथि अग्नि वैश्वानर का अनुसरण करते हुए सदानीरा (गंडक) नदी के तट तक आए। इस नदी के पूरब उन्होंने एक राज्य स्थापित किया। कालान्तर में यह राज्य पूर्वी विदेह तथा पश्चिमी विदेह में विभाजित हुआ। राजा विशाल के नाम पर पश्चिमी विदेह का नाम वैशाली हो गया। वाल्मीकि रामायण के बालकांड सर्ग 47, श्लोक 11-12 को देखें –
श्क्ष्वाकोस्तु नरव्याघ्रः पुत्रः परमधार्मिकः।
अलंबुषायामुत्पन्नो विशालइति विश्रुतः।।
तेनचासीदिह स्थाने विशालेतिपुरीकृता।।

श्रीमद्भागवात के नवम स्कंध में वर्णित है कि वैवस्वत मनु एवं उनकी सहधर्मिणी श्रद्धा के दस पुत्रों में एक इक्ष्वाकु एवं दूसरे दिष्ट थे। भागवतपुराण के अनुसार राजा विशाल राजा दिष्ट के वंशज थे। राजा विशाल के वंशज राजा सुमति अयोध्या नरेश दशरथ के समकालीन थे। राजा सुमति एवं जनमेजय के पश्चात् कई शताब्दियों तक वैशाली का इतिहास अंधेरी सुरंग में है। पुनः 725 ई0पू0 से 484 ई0पू0 तक की अवधि में वैशाली वज्जिसंघ की राजधानी तथा गणतंत्र की आदिभूमि के रूप में प्रतिष्ठापित होती है। इतिहासकार डॉ0 स्व0 योगेन्द्र मिश्र ने वैशाली गणतंत्र के इतिहास को दो कालखंडों में विभक्त किया है।

(1) 725 ई0पू0 से 484 ई0पू0 तक, (2) 120 ई0पू0 से 399 ई0 तक। हॉलाकि 120 ई0पू0 से 399 ई0 तक वैशाली के इतिहास के संबंध में जानकारी अत्यल्प है। काशी प्रसाद जायसवाल एवं डॉ0 अनन्त सदाशिव अल्तेकर जैसे विद्वानों का मानना था कि विदेशी कुषाणों को भारत से खदेड़ने में लिच्छवी एवं भौधेय जैसे गणतांत्रिक समुदायों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही।

547 ई0पू0 में मगघ-सम्राट बिम्बिसार ने वज्जिसंघ पर आक्रमण कर वैशाली को संधि के लिए बाध्य किया। वैशाली संघ के प्रमुख चेतक की पुत्री चेल्लना से बिम्बिसार ने विवाह किया। बिम्बिसार पुत्र अजातशत्रु ने अपने मंत्री वर्षकार को भेजकर लिच्छिवियों के बीच फूट पैदा की और वज्जिसंघ को पराजित कर मगध-साम्राज्य के अधीन कर लिया। शुंगवंशी राजा पुष्पमित्र और उनके पुत्र अग्निमित्र के पश्चात् प्रथम शताब्दी के अंत में वैशाली कुषाणराजा कनिष्क के अधीन रही। परवर्तीकाल में हर्षवद्र्धन (606 ई0-647 ई0) ने वैशाली पर राज किया। कुछ दिनों के लिए वैशाली तिब्बत के प्रभाव क्षेत्र में रहा। पालवंश से शासित होने के बाद के काल में नान्यदेव ने उत्तर बिहार में कर्नाट वंश की स्थापना की।

1324 ई0 में दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के आक्रमण के साथ तिरहुत के कर्नाट वंश का सूरज सदा के लिए अस्त हो गया। लिच्छवीगण कहाँ गए उनकी पहचान का पता भी नहीं चला। जिस स्थान पर वैशाली गढ़ था, वह कालान्तर में बसाढ़ के नाम से जाना गया। बसाढ़वासियों को यह पता भी नहीं था कि उस धरती के नीचे एक महान सभ्यता दफन है। यह क्षेत्र ऋणी है। अंग्रेज इतिहासकार एवं पुराविद कनिंघम महोदय का और आइ.सी.एस. जगदीश चन्द्र माथुर का धन्यवाद जिनके भगीरथ प्रयास से वैशाली के इतिहास पर पड़े मोटे गर्द को हटाया जा सका। दुनिया ने जाना कि जब यूरोप एवं दुनिया के अन्य हिस्सों में समाज बर्बर अवस्था से निकलने का प्रयास ही कर रहा था, वैशाली में गणतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था फल-फूल रही थी।

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