Learn Pranayama | प्राणायाम सीखें

‘प्राणायाम’ प्राणवायु को नियंत्रित करने की प्रक्रिया है। हमारे प्राचीन ऋषियों का मानना था कि प्रत्येक जीव के साँसों की संख्या निश्चित  होती हैं। जीव यदि उस साँस को अव्यवस्थित रूप से व्यय करता है, तो वह एक दिन अपनी जीवनी शक्ति गंवा कर अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि वह प्राणायाम के द्वारा अपनी साँसों को नियंत्रित करके ‘ध्यान’ लगाए, तो न केवल उसके प्रत्येक साँस की अवधि लम्बी हो जाती है, अपितु वह इससे अपनी शारीरिक एवं मानसिक चेतना को बढ़ाकर अपने जीवन की निर्धारित साँसों की संख्या को बढ़ा भी सकता है।
इस सिद्धांत पर अनेक ऋषियों द्वारा प्रयोग एवं अन्वेषण होते रहे और यह भी खोज निकाला गया कि साँसों के प्रभाव से शरीर एवं जीवनशक्ति का नाश सामान्य रूप में ही होता है। प्राणायाम के द्वारा शरीर को साँसों के विनाशक प्रभाव से बचाया जा सकता है और कालजयी जीवन (इसका अर्थ अमर नहीं है, अपितु दीर्घ जीवन है) प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषि-मुनि लम्बे समय तक प्राणायाम के माध्यम से समाधि में चले जाते थे। उस समय उनकी साँस नहीं चलती थी, इसलिए शरीर काल के प्रभाव से अछूता रहता था।
प्राणायाम केे माध्यम से ही सिद्ध योगी अपने सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करके अन्तरिक्ष में विचरण किया करते थे।
पश्चिमी विज्ञान के सिद्धान्तों से प्रभावित लोग सूक्ष्म शरीर की मान्यता का मजाक उड़ाते नजर आते है, किन्तु यह शरीर प्रत्येक जीव में है और इसका स्वरूप पूर्णतया वैज्ञानिक है। भारतीय योग, तन्त्र एवं तप के तमाम प्रयोगों में इस सूक्ष्म शरीर की रचना का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण स्वरूप प्राणायाम की साधना का अभ्यास करने के पश्चात् योगीगण इसकी सहायता से कुंडलिनी को जाग्रत करने का प्रयत्न करते हैं। इस कुंडलिनी का अस्तित्व सूक्ष्म शरीर में ही है। इसके चक्रों की रचना, आकृति और स्थान का जो विवरण योगशास्त्र में दिया गया है वैसी कोई भी रचना स्थूल के उस भाग में नहीं है। बहुत से लोग यह प्रश्न उठाते हैं। कि जब सूक्ष्म शरीर को देखा नहीं जा सकता, तो उसके अस्तित्व पर कैसे विश्वास किया जाए? एक तो यह सिद्धान्त ही अज्ञानतापूर्ण है कि जो भी इन्द्रियों के द्वारा अनुभूति में आता है, वही सत्य है। क्योंकि हमारी अनुभूति किसी शाश्वत मापदंड में नहीं बंधी हुई है। नित नए अविष्कार हो रहे हैं ओैर उसके होने से पहले वे सिद्धान्त हमारे ज्ञान में नहीं होता। इसलिए यह दावा करना वज्र मूर्ख का कार्य है कि जो कुछ भी वह जानता है, संसार का सत्य वहीं तक है।
सूक्ष्म शरीर और उसकी उर्जा के तरंगों का अनुभव हम प्राणायाम के अभ्यास से कर सकते हैं। यदि हमने कुंडलिनी पर ‘ध्यान लगाया तो तीन से छह महीने के अन्दर उसकी विलक्षण शक्ति का अनुभव होने लगता है। उसके प्रारम्भिक चक्रों का भी अनुभव होने लगता है।

प्राणायाम से लाभ
प्राणायाम से फेफड़े लचीले होते हैं। इससे रक्त-शोधन की क्रिया तेज हो जाती है। साँस गहरी हो जाती है, जिससे ऑक्सीजन अधिक मात्र में फेफड़े को प्राप्त होता है। इससे हृदय को बल मिलता है। शरीर के आन्तरिक अंगों के विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं। कब्ज समाप्त होता है। जठराग्नि प्रज्ज्वलित होती है। भूख खूब लगती है। शरीर की नस-नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती हैं। स्नायुमंडल को बल मिलता है और शरीर बलशाली एवं दीर्घायु होता है।
प्राणायाम से मस्तिष्क को असीमित बल प्राप्त होता है। बिना ध्यान के भी प्राणायाम के कारण रक्त अधिक मात्र में मस्तिष्क में पहुँचता है। इससे इसके विकार नष्ट होते हैं। इसकी शक्ति भी बढ़ती है।
प्राणायाम में ‘ध्यान’ लगाने के लाभ असीमित हैं। इसके लाभ का वर्णन करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है।

प्राणायाम के अभ्यास से सम्बन्धित कुछ आवश्यक बातें

  1. प्राणायाम के अभ्यास के लिए सबसे अच्छा समय ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे से सूर्योदय पूर्व तक) है। इस समय यदि सम्भव नहीं हो, तो सूर्य निकलने के एक घंटे के अन्दर करें ।
  2. प्राणायाम का अभ्यास सदा खुली हवा में करें । तेज हवा नहीं हो, किन्तु स्थान खुला हुआ और प्रदूषण मुक्त हो।
  3. ब्रह्म मुहूर्त में प्राणायाम का अभ्यास किसी पेड़ या लताकुंज के साये में नहीं करें।
  4. यदि विवशता हो और इसका अभ्यास कमरे में ही करना हो तो कमरे की खिड़की और दरवाजे को खुला रखें।
  5. प्राणायाम जहाँ भी करें, वह स्थान प्रदूषण मुक्त होना चाहिए और एकान्त हो।
  6. प्राणायाम शौचादि नित्य क्रिया के पश्चात् प्रातःकाल ही खाली पेट करना चाहिए।
  7. प्राणायाम के बाद कोई योगासन न करें। योगासन करना है, तो प्राणायाम के अभ्यास से पूर्व ही करे लें।
  8. प्राणायाम के समय यथासम्भव शरीर खुला रखें। कपड़े कम एवं ढीले होने चाहिए।
  9. प्राणायाम पद्मासन में करें। पद्मासन न लगा सकते हों, तो सुखासन में भी इसे किया जा सकता है।
  10. प्राणायाम करते समय कमर, पीठ, गर्दन, रीढ़ की हड्डी, दृष्टि आदि सीधा रखें।

प्राणायाम के लिए कुछ प्रारम्भिक क्रियाओं का परिचय

  1. रेचक – साँस को बाहर निकालने की क्रिया रेचक है।
  2. बाह्य कुम्भक – साँस को रेचक के द्वारा निकालकर उसे बाहर ही रोकने की क्रिया बाह्य कुम्भक है।
  3. पूरक – साँस को अन्दर खींचने की क्रिया पूरक है।
  4. आन्तरिक कुम्भक – पूरक साँस को अन्दर ही रोकने की क्रिया आन्तरिक कुम्भक हैं।
  5. अनुलोम-विलोम – यह नथुनों के छिद्र से साँस लेने का एक अभ्यास है। वास्तव में मनुष्य की नासिका में छिद्र तो दो होते हैं, किन्तु दोनों समान रूप से एक समय में काम नहीं करते। एक तेज, दूसरा मद्धिम गति से कार्य करते है। इस अभ्यास से दोनाें नासिका की साँस की गति को एक समान करने का अभ्यास किया जाता है।
  6. इड़ा नाड़ी (चन्द्र नाड़ी) – इसे तमोगुण प्रधान नाड़ी माना जाता है। यह एक ठंढी नाड़ी है और शरीर के बाएँ भाग के विचारों को नियंत्रित करती है।
  7. पिंगला नाड़ी (सूर्य नाड़ी) – रजोगुण प्रधान नाड़ी मानी जाती है। यह शरीर के दाएँ भाग को नियंत्रित करती है। यह मनुष्य की प्राण शक्ति को नियंत्रित करके उसे गर्मी देती है।
  8. सुषुम्ना नाड़ी – यह मध्य नाड़ी मानी जाती है। मेरुदंड में स्थित है। कुंडलिनी के आठों शक्ति चक्र इसी में स्थित होते हैं। यह चेतना ज्ञान प्रकाश प्रदान करने वाली प्राण नाड़ी है। इसकी अनेक शाखाएँ एवं उपशाखाएँ सम्पूर्ण शरीर में जाल की भाँति फैली हुई होती है। यह सतोगुण प्रधान नाड़ी है।

आयुर्वेद, योग, तंत्र आदि में इन्हीं तीनों नाड़ियों के संतुलन से शरीर को स्वस्थ माना जाता है। इनका संतुलन बिगड़ता है तो शरीर अस्वस्थ हो जाता है।
योग एवं तंत्र विज्ञान में सुषुम्ना नाड़ी का बड़ा महत्व है। यह नाड़ी हमेशा तटस्थ रहती है। यदि इसे सक्रिय कर दिया जाए, तो शरीर एवं मस्तिष्क से असीमित ऊर्जा का संचारण होने लगता है। कुंडलिनी-साधना में इस नाड़ी को गतिशील करने का प्रयत्न किया जाता है।

नासिका बन्ध
प्राणायाम के अभ्यास में अक्सर नासिका के किसी एक छिद्र को, जो कभी बायाँ होता है, तो कभी दायाँ बंद करना होता है। इसका अभ्यास पूर्व में ही कर लेना चाहिए।
दायाँ नासिका- छिद्र बंद करने की विधि-दाएँ हाथ के अंगूठे से दाएँ नासिका छिद्र के बाहरी भ्ााग को चित्रनुसार दबाएँ और बाएँ नासिका-छिद्र से साँस खींचे।
बायाँ नासिका छिद्र बंद करने की विधि- दाएँ हाथ की अनामिका उंगली से बाएँ नासिक-छिद्र की बाहरी दीवार को दबाएँ। दाएँ छिद्र से साँस खींचे।
नाक के एक छिद्र को बंद करके दूसरे से साँस लेना, फिर दूसरे को बंद करके पहले से साँस छोड़ना। उसे दबाना, फिर दूसरे से साँस छोड़ना।
इस क्रम में लगातार अभ्यास करते रहें।
कुछ दिनों के अभ्यास से नाक को उंगली से बंद करने की आवश्यकता नहीं होती।

प्राणायाम के प्रकार
प्राणायाम के अनेक प्रकार हैं। यहाँ कुछ मुख्य प्राणायामों के बारे में बताया जा रहा है।

1- कपालभाति प्राणायाम

Kapalbhati

कपालभाति क्रिया का आपने षट्कर्म में अभ्यास किया है। प्राणायाम के रूप में इस कपालभाति के कुछ विस्तृत स्वरूप अभ्यास में लाये जाते हैं।

विधि- भूमि पर आसन बिछाकर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में बैठ जाएँ। पहले साँस को धीरे से खींचें, फिर झटके से उसे बाहर निकालें। धीरे-धीरे यह क्रिया तेज करते जाएँ। इसमें आप झटके के साथ रेचक क्रिया करते रहने पर ही ध्यान दें। पूरक अपने आप हो जाएगा। गर्दन को दाएँ बाएँ करते जाएँ। अब दाई नासिका को बंद करके बाई नासिका से रेचक करें। यह रेचक झटके, से होना चाहिए और प्रत्येक बार गति तेज करते जाना चाहिए।
अब तर्जनी से बायीं नासिका को बंद करके दाई नासिका से रेचक करें। यह प्राणायाम जल नेति, सूत्र नेति या तेल नेति करने के बाद निश्चित रूपेण करना चाहिए।

लाभ- यह नाक और फेफड़े के साथ-साथ गले की गन्दगी को बाहर निकाल देता है। इससे चेहरे को झाई, फुन्सी, बर्रे आदि दूर होते हैं। चेहरे, ललाट, आँखों आदि में चमक बढ़ती है।

सावधानियाँ- (1) रेचक करते समय रुके नहीं। (2) गर्दन लगातार संचालित रहनी चाहिए। लेकिन उसे जोर से झटका न दें।

2- नाड़ी-शोधन प्राणायाम

nadi-shodhana

नाड़ी शोधन प्राणायाम से नाड़ियो के विकारों का शोधन हो जाता है।

विधि- कपालभाति प्राणायाम की भाँति आसन लगाकर बैठ जाइए। मस्तिष्क को शांत रखिए। आँखें बंद कीजिए। दाएँ हाथ के अँगूठे से दाएँ नथुने को दबाकर बंद कर लीजिए। बाएँ नथुने से धीरे-धीरे पूरक कीजिए। जब पूरक क्रिया पूर्ण हो जाएँ तो दाएँ हाथ की अनामिका से बाएँ नथुने को बंद करके दाएँ नथुने से रेचक कीजिए। बाएँ नथुने से पूरक कीजिए और फिर इसे बंद करके दाएँ से रेचक कीजिए। यह एक चक्र है। इस प्रकार के तीन चक्र से प्रारम्भ करके तीस चक्र तक अभ्यास करें। रेचक और पूरक धीरे-धीरे करें। साँस की आवाज कानों को सुनाई नहीं देनी चाहिए।

लाभ- इस प्राणायाम के अभ्यास से शरीर की नसों एवं नाड़ियों की शुद्धि होती है। हृदय में रक्त संचार की गति स्वाभाविक होती है। इससे हृदय को बल मिलता है। सर्दी, जुकाम, कफ आदि विकार दूर होते है। दोनों नासिका छिद्र खुलते हैं। मन-मस्तिष्क को शान्ति मिलती है। सिर दर्द और मानसिक अशान्ति दूर होती है।

सावधानियाँ- (1) साँस की गति धीमी रखें। (2) शरीर को सीधा रखें। कमर, पीठ, रीढ़, गर्दन सीधी रखिए।

3- चन्द्रभेदी प्राणायाम

chandra bhedi pranayam

इस प्राणायाम से इड़ा नाड़र शुद्ध होती है। यह नाड़ी जागृत होकर स्वस्थ प्राकर से कार्य करती है।

विधि- भूमि पर आसन बिछाकर पद्मासन, सुखासन या सिद्धासन की मुद्रा में बैठ जाइए। कमर, गर्दन, रीढ़ की हड्डी आदि सीधी करके रखें। शान्त भाव धारण कीजिए। बाएँ हाथ को बाएँ घुटने पर रखिए। दाएँ हाथ के अंगूठे से नासिका का दायाँ छिद्र दबाकर बंद कीजिए। अब नासिका के बाएँ छिद्र से पूरक कीजिए। श्वास को पूरा खींचकर कुम्भक लगाइए। जालन्धर बंद लगाइए। सरलतापूर्वक जितनी देर तक इस आसन में रह सकते हैं, रहिए।
अब दाएँ हाथ की अनामिका से बाएँ नासिका-छिद्र को बंद कीजिए और दाएँ नासिका छिद्र से रेचक कीजिए और बंद खोलिए।
यह चन्द्रभेदी प्राणायाम का एक चक्र है। इस प्रकार के प्रारम्भ में तीन चक्र, बाद में तीस तक अभ्यास करें।

ध्यान- चन्द्रभेदी प्राणायाम में शान्तभाव होकर स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान लगाना चाहिए।

लाभ- चन्द्रभेदी प्राणायाम से पित्त शान्त होता है। खट्टी डकारें बंद होती है। पाचन-शक्ति ठीक होती है। थकावट दूर होती है। शरीर और मस्तिष्क की गर्मी दूर होती है।

सावधानियाँ-(1) यह प्राणायाम सर्दी के दिनों में नहीं करना चाहिए। (2) इस प्राणायाम में जोर से साँस लेनी चाहिए और जोर से ही साँस निकालनी चाहिए।

4- सूर्यभेदी प्राणायाम

surya bhedi pranayam

इस प्राणायाम से पिंगला अर्थात् सूर्य नाड़ी का शोधन होता है। इसलिए इसे सूर्यभेदी प्राणायाम कहते है।

विधि- आसन पर पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाएँ। आँखें बंद कीजिए। बाएँ हाथ से बाएँ घुटने को पकड़िए। दाएँ हाथ की अनामिका से नासिका के बाएँ छिद्र को दबाकर बंद कीजिए। नासिका के दाएँ छिद्र से आवाज करते हुए जोर से पूरक करें। पूर्ण पूरक करके कुम्भक लगाएँ। जालन्धर बंद लगाकर जितनी देर रह सकते हैं, रहिए। अब दाएँ नासिका छिद्र से रेचक कीजिए। इसके साथ ही जालन्धर बन्ध खोलिए।
प्रारम्भ में चक्र का अभ्यास एक बार करें। बाद में इसे तीस चक्र तक कर सकते हैं।

ध्यान- इस प्राणायाम में रीढ़ में ऊर्जा ग्रहण करने का ध्यान लगाना चाहिए।

लाभ- कफ का नाश होता है। पित्त घटता है।

इसके आगे  धौति क्रिया के बारे जानें…..

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