धौति क्रिया | Dhouti Kriya

धौति क्रिया
हजारों वर्ष पहले से भारतीय ऋषिमुनिगण वायु और जल की सहायता से शरीर के भीतरी भागों को धोते थे। उन्होंने इस पद्धति का नाम दिया था धौति। धौति के द्वारा शरीर के प्रदूषित कण साफ हो जाते है। शरीर में नई कर्मशक्ति आती है।

सावधानियाँ-

(1) शरीर का ऊर्ध्वाश (कपाल और नासिका प्रदेश, धौति का नाम नेति।

(2) शरीर का मध्यभाग (छाती, फेफड़े और हृदय) धौति का नाम वस्तिक्रिया।

अग्निसार धौति
1 नं पद्धति: पद्मासन या किसी भी ध्यानासन में बैठें। अब धीरे-धीरे साँस ग्रहण करने के साथ-साथ नाभि को स्पर्श करें। मेरुदंड पेट को स्पर्श करे इस प्रकार बैठें। साँस छोड़ते हुए शरीर को ढ़ीला करें। साँस लेते समय 5 सकेन्ड तथा छोड़ते समय 10 सेकेण्ड का समय लें। इस तरह 25-200 बार अभ्यास करें।
2 नं पद्धति: किसी भी ध्यानासन में बैठकर साँस छोड़ते हुए पेट खाली करें। अब 5-10 बार नाभि को पेट से लगाएँ। साँस ग्रहण करते हुए 5-10 सेकेण्ड विश्राम लें। 25-100 बार अभ्यास करें। 8 साल की उम्र से सभी इसे कर सकते हैं। इसे हृदय स कमजोर व्यक्ति न करें।

लाभ:

(1) वस्तिप्रदेश के स्नायु पेशी मजबूत होते हैं।

(2) जठराग्नि प्रबल होती है।

(3) प्लीहा, यकृत स्वस्थ हाते है।

(4) पेट की गैस कब्ज आदि रोग ठीक होते हैं। कॉलेरा ठीक हो जाता है।

(5) मूत्रशय की त्रुटियाँ दूर होती हैं।

(6) कामोत्जेना कम होती है।

(7) वीर्य की रक्षा में सहायक।

(8) माताओं, बहनों के स्त्री रोगों को ठीक करती है।

सरल अग्निसार धौति

प्रणाली: पप्रासन या किसी भी ध्यानासन में बैठें। दोनों हाथों की बीचवाली उँगली को चित्रनुसार नाभि के ऊपर रखें। अँगूठो को कमर में रखें। अब सभी उँगलियों से इस तरह दबाव डालें कि नाभि मेरुदण्ड को स्पर्श करने लगे। 3-5 सेकेण्ड दबाकर अँगुलियों के दबाव को शिथिल करें। इस तरह 15-100 बार अभ्यास करें। साँस सामान्य रखें। तोंदवालों के लिए यह व्यायाम लाभदायक है। पहले पहल थोड़ी सी वेदना होती है। 3 महीने के बच्चों को धीरे-धीरे यह व्यायाम कराया जा सकता है। माताएँ गर्भावस्था में इसे न करें।

लाभ: योगाचार्य स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी ने कहा है – मेरे द्वारा आविष्कृत धौति द्वारा कब्ज, कॉलेरा, गैस की बीमारियाँ जादू की तरह से दूर किया जा सकता है।

(1) उपरोक्त रोगियों को वे सिर्फ नींबू के रस का पानी पिलाकर यह व्यायाम आधे घण्टे के अंतराल से 25-50 बार कराकर सम्पूर्ण स्वस्थ करा चुके है।

(2) कब्ज के रोगीगण इसे रोज सुबह-शाम 25-100 बार करने से 2-3 सप्ताह में लाभ प्राप्त कर सकेंगे। यकृत की शक्तिवृद्धि के लिए विपरीतकर्णी मुद्रा, सर्वागासन मत्स्यासन आदि आसन भी कर सकते हैं।

(3) यह सभी प्रकार की कृमियों का नाश करता है।

(4) अजीर्ण को दूर करता है।

सरल अग्निसार धौति

प्रणाली: सुबह उठकर 5-6 ग्लास गुनगुने पानी का सेवन करें। बिना देर किए ऊर्ध्वाश सामने की ओर झुकाएँ। उल्टीयाँ होगी तथा सारा पानी उल्टी के आकार में बाहर निकल आयेगा। उल्टीयाँ न आने पर नमक मिला हुआ गरम पानी पी लें। इससे भी अगर उल्टीयाँ न आए तो उँगली से गले के अन्दर तक हिलाएँ। अंतर से क्षार, गन्दे एवं प्रदूषित जलकण तथा श्लेष्मा बाहर आ जाते हैं। 13 साल की उम्र के सभी व्यक्ति इसे कर सकते है। उच्चरक्तचाप के रोगी इसे न करें तो बेहतर होगा।

लाभ:

(1) अल्मविष, पित्तविष, श्लेष्मा, कफ आदि दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते है। जिसे निकालने के लिए हृदय को काफी मेहनत करती पड़ती है।

(2) इस सभी पदार्थो के रहने से फोड़े -फुंसियाँ आदि रोग होते हैं। धौति के फलस्वरूप यह सब ठीक हो जाते हैं।

(3) अजीर्ण, कब्ज की बीमारियाँ दूर हो जाती है।

वस्ति क्रिया
गाँवों में माताएँ-बहनें सुबह-सबेरे उठकर जैसे, घर-आँगन को साफ-सुथरा करके रखती हैं।, शहरों में जिस तरह रास्तों, गलियों को नगरपालिका के कर्मचारी साफ रखते हैं। उसी प्रकार हमारा शरीर भी रात से जमा हुए कचरे को शरीर से मल-मूत्र के रूप में बाहर निकाल फेंकता है।
1 नं प्रणाली: सुबह नींद से जागकर हाथ-मुँह धोकर 2-3 ग्लास जल पियें देर न करें। (1) विपरीत कर्णी मुद्रा – 3 मिनट (2) मयूरासन 5 बार (3) पादहस्तासन चार बार। मलवेग न आने तक तेज कदमों से टहलते रहें।
2 नं प्रणाली: 2-3 ग्लास पानी पीने के बाद -(1) उड्डियान बन्ध मुद्रा सात बार। (2) पवनमुक्तासन चार बार ‘5-10 मिनट टहलने के बाद मलवेग आयेगा एवं आपका पेट साफ हो जाएगा।
3 नं प्रणाली: कठिन कब्ज रोगियों के लिए नमक और नींबू पानी मिला हुआ गुनगुना पानी पीने के बाद – (1) अर्धकूर्मासन 8 बार। (2) योगमुद्रा 8 बार (3) पदहस्तासन 5 बार। 5-10 मिनट टहलने के बाद मलवेग आएगा।
4 नं प्रणाली: कमजोर, वयस्क और कठिन कब्ज रोगियों के लिए नींबू रस मिला गुनगुना पानी पीने के बाद 5-10 मिनट टहलने के बाद शौच करें एवं मलशोधन क्रिया का अभ्यास करें।

मलशोधन क्रिया या गणेशक्रिया
मध्यमा उँगली मधु या सरसों का तेल लगाकर धीरे-धीरे मलद्वार प्रवेश कराएँ। नाखून सुरक्षित रूप से कटे होने चाहिए। उँगली निकालकर मलकण धोकर फिर दोहराएँ। इस तरह 3-4 बार करें।

नेतिक्रिया-नासापान
नासापान: एक बड़े मुँहवाले बर्तन में साफ पानी भरकर झुककर उसमें अपने नाक को डुबोएँ। अब धीरे-धीरे पानी खीचें। पहलीबार जलन महसूस होगी, छींक भी आएगी। नासापान के कौशल को अपनाएँ। पहलीबार 2-3 बार पानी फेकें फिर बाकी पानी पी लें। क्योंकि पहले पानी में श्लेष्मा आदि रह सकते हैं। 1-2 ग्लास जलपान करें। अब एक नाक से पानी खींचकर फिर दूसरे नाक बाहर निकालने की कोशिश करें। प्रतिदिन नासापान करना लाभदायक है। समय न रहने पर सप्ताह में दो दिन करें।

लाभ:

(1) नाक के अग्रभाग में श्लेष्मा नहीं जमती

(2) सिरदर्द नहीं होता, ऐसा कि बुखार के वक्त भी सिरदर्द नहीं होता।

(3) सर्दी जम नहीं पाती।

(4) सिर ठण्डा रहता है।

(5) नाक में नकसीर नहीं होता।

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