Learn about Pranayama | प्राणायाम के बारे में जाने

प्राणायाम सीखें
प्राणों के आयाम या विस्तार को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम अभ्यास से जीवन-शक्ति वृद्धि पाती है। इस प्राणायाम के सहारे साँप, मेंढ़क आदि प्राणी शीतऋतुओं में इसी प्रणाली से साँस लेते हैं एवं निद्रावस्था में रहते हैं। प्राणायाम के समय वायु के रूप में पर्याप्त ऑक्सीजन प्रतिशोधक क्षमता बढ़ा लेते हैं। इस प्रणायाम को करने में कोई त्रुटि हो तो अनिष्ट होने का भय नहीं रहता।
प्राणायाम के तीन स्तर: पूरक-साँसग्रहण करना, कुम्भक-साँस को रोके रखना, रेचक-साँस को त्यागना।

प्राणायाम के सम्बन्ध में विशेष सावधानियाँ
(1) धुएँ, धूल कणयुक्त स्थान, भींगे एवं सीलनभरे, दुर्गन्धयुक्त स्थान कोहरे व बारिश के समय प्राणायाम नही करना चाहिए। दूसरे आसनों के समय भी यही नियम मानकर चलने चाहिए

(2) प्राणायाम के समय अधिक मात्र में ऑक्सीजन प्रवेश करता है यदि धूलकण प्रवेश करेंगें तो नुकसान होगा।

(3) जल्दबाजी में कोई प्राणायाम या आसन करना उचित नहीं है।

(4) प्रथमबार प्राणायाम अभ्यास के समय छाती में दर्द होता है। इसमें डरने की कोई बात नहीं हैं। दो-तीन दिन प्राणायाम बंद रखने से यह ठीक हो जाएगा। तब फिर प्राणायाम को दोहराएँ। जोर-जोर से साँस लेने के कारण ऐसा होता है।

12 साल की उम्र के लड़के-लड़कियों के लिए प्रणालियाँ
पहली प्रणाली: दोनों हाथों को सीधे एवं सटीक तरह से झुलाए रखें। इस बार गंभीर रूप से साँस ग्रहण करते हुए दोनों हाथों को चित्रनुसार ऊपर उठाएँ। साँस छोड़ते हुए हाथों को नीचे करें। ऐसा 10-20 बार करें।
दूसरी प्रणालीः मुक्का बनाते हुए दोनों हाथों को सीधे करके चित्र की तरह खड़े हो जाएँ। अब साँस खींचे। दोनों हाथों को साँस छोड़ते हुए नीचे लाएँ।
तीसरी प्रणाली: दोनों हाथों को चित्रनुसार नाभि के नीचे रखें। फिर ऊपर की ओर उठाएँ। साँस छोड़ते हुए नीचे लाएँ। 10-20 बार अभ्यास करें।

लाभ:

(1) साँस यंत्र (फेफड़े) या हृदय मजबूत होते हैं।

(2) सीने के पिजड़ बढ़ जाते है। सीने का आकार सुन्दर होता है।

(3) श्लेष्मा के रोगी ठीक हो जाते हैं।

(4) सर्दी-खासी, इन्फ्रलूएँजा, टॉयफॅयड, निमोनिया, दमा, फुँसी-फोड़े आदि आक्रमणों का भय नहीं रहता।

(5) रक्तदोष दूर होता है।

12 साल से ज्यादा व्यस्कों के लिए प्राणायाम
नाड़ीशोधन या अनुलोम-विलोम प्राणायाम:

किसी भी ध्यानासन में बैठें एवं दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा उँगली को तलवे के साथ मिलाकर अँगूठे की सहायता से दायाँ नाक बन्द कर के बाएँ नाक से साँस खींचे। अब अनामिका और छोटी उँगली की सहायता से बाएँ नाक को बन्दकर के दाएँ नाक से धीरे-धीरे साँस छोड़ें। साँस छोड़ेने के साथ ही नाक से उसी तरह साँस ग्रहण करें। इसकी पुनरावृति करते हुए दाएँ नाक को बंद करते हुए बाएँ नाक से साँस छोड़ें। साँस ग्रहण के 5 सेकेण्ड और साँस छोड़ने के 10 सेकेण्ड समय लेने चाहिए। इसी तरह 20-30 बार करें।

लाभ:

(1) नाक में जमा श्लेष्मा निकल जाता है। फलस्वरूप प्राणायाम की बाधा दूर होती है।

(2) नाक के अन्दर पॉलीपॉन रोग दूर होता है।

(3) उच्चरक्तचाप और हृदयरोग ठीक होता है।

(4) सिरदर्द, सिर के रोग, स्नायु की दुर्बलता, दिमागी कमजोरियाँ, अनिद्रा मानसिक चंचलता, वातरोग फोड़े-फुँसियाँ आदि ठीक हो जाते हैं।

(5) सर्दी-खाँसी, इन्फ्रलुएन्जा टॉयफॉयड निमोनिया रोगों से सुरक्षा मिलती है।

सूर्यभेदक प्राणायाम:

किसी भी ध्यानासन में बैठें। नाक से अन्दर तक साँस लें। अब धीरे-धीरे ठोड़ी को गले तक लाएँ। साँसग्रहण करते-करते धड़ को सीधा करें। 20-30 बार अभ्यास करें। इससे टाँसिल रोग दूर होता है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम के समस्त सुफल प्राप्त होते है।

उज्जयी प्राणायाम:

किसी भी ध्यानासन में बैठ कर दोनों नाकों से दमभर कर वायु अन्दर लें। अब धीरे-धीरे मुँह के द्वारा साँस बाहर निकालें। ऐसा 20-30 बार करें।

लाभ:

(1) मुँह के दाग ठीक होते हैं।

(2) प्लीहा एवं यकृत के दोष दूर होते है।

(3) अनुलोम-विलोम प्राणायाम के समस्त सुफल प्राप्त होते है।

शीतली प्राणायाम:

किसी भी ध्यानासन में बैठें। चित्रनुसार मुँह को पक्षी के होठों की तरह तीखा करके धीरे-धीरे दमभर के साँस खींचे। आकर्षित वायु को निगलकर गले में अटका लें। अब दोनों नासिका द्वारा साँस को बाहर निकालें। साँस छोड़ते हुए जीभ को सामान्य अवस्था मेें रखें। मुँह बंद रखें। 20-30 बार ऐसा दोहराएँ।
मूसलाधार बारिश के समय, अग्रहायण, पौष, माघ इन तीन महीनों में शीतली प्राणायाम करना निषिद्ध है। ठण्ड लगने का डर रहता है। सर्दी खाँसी के रोगियों को गर्मी में इस आसन को करना चाहिए।

लाभ:

(1) रक्तदोष दूर होते है।

(2) फोड़े-फुंसियाँ एवं चमड़े के दोष दूर होते हैं।

(3) पित्त प्रधान धातु के रोगयुक्त व्यक्तियों के हाथ पाँवों के जलन दूर होते हैं।

(4) अधिक गर्मी के समय 5-10 बार अभ्यास करने से ही तुरन्त आराम मिलता है।

(5) बहुत प्यास के समय 5-10 बार करने से ही प्यास खत्म हो जाती है।

भस्त्रिका प्राणायाम:

किसी भी ध्यानासन में बैठ कर दमभर वायु आकर्षण करें। शीतली प्राणायाम की तरह जीभ को नुकीला करके 5-10 बार रूक-रूक कर साँस छोड़ें। साँस ग्रहण के समय जीभ सामान्य रखके मुँह बंद रखें। 5-20 बार या 10-20 बार अभ्यास करें।

लाभ:

(1) मुँह के दाग दूर होते हैं।

(2) हकलाने की समस्या दूर होगी।

(3) मुँह के घाव दूर होते है।

(4) स्वर मीठा होता है।

(5) स्वर भंग दूर होता है।

(6) अनुलोम-विलोम प्राणायाम के सुफल मिलते है।

सिंहासन प्राणायाम:

किसी भी ध्यानासन में बैठ कर नाक से दसभर साँस लें। अब सिंहासन के मुद्रा में जीभ को यथासाध्य बढ़ा लें और जोर-जोर से आवाजें निकालें। सीटी बजाने की आवाज आएगी। 20-30 बार ऐसा दोहराएँ।

लाभः

जीभ की जड़त्वता, पक्षाघात, दाग-धब्बे आदि दूर होते हैं।

दिमागीशक्ति या मूर्छा प्राणायामः

उष्ट्रासन की भंगिमा में बैठें या सीधे होकर पीठ को पीछे झुकाएँ। हाथों को सीने के ऊपर रखें। अब दोनाें नासिकाओं से साँस खींचे। अब दोनों नाक से साँस त्याग करें। अब धीरे-धीरे कमर सीधी करें। हाथ भी सामान्य रूप से खुले रहेंगे। 10-20 बार अभ्यास करें।

श्रवणशक्ति विवर्धक प्राणायामः

किसी भी ध्यानासन में बैठकर दोनों कानों को अँगूठे से बंद करें। अब दोनों नाकों से दमभर साँस लें। अब दोनों नाक से साँस त्याग करें। 20-30 बार अभ्यास करें।

लाभ:

(1) श्रवणशक्ति में वृद्धि होती है।

(2) कान के रोग ठीक होते हैं।

(3) अनुलोम-विलोम प्राणायाम के सारे लाभ मिलते हैं।

कपालभाति प्राणायाम:

किसी भी ध्यानासन में बैठकर नाक से साँस लेते हुए पेट को संकुचित कर साँस छोड़ें। पन्द्रह मिनट यह क्रिया दोहराएँ।

लाभ:

यह प्राणायाम नियमित करने से गैस नहीं जमती। अजीर्ण, कब्ज आदि रोग ठीक होते है।

शीत्कारी प्राणायाम:

पहले किसी भी ध्यानासन में बैठकर जीभ को दाँतों के बीच लगाकर तलवे के साथ लगाते हुए होंठों से सीटी की आवाज निकालकर साँस अन्दर की तरफ भरें। कुछ देर कुम्भक की हालत में मुँह बंद करके नाक से साँस छोड़ते हुए अभ्यास करें। ऐसा 8-10 बार दोहराएँ।

लाभ:

इस प्राणायाम के अभ्यास से सर्दी-खाँसी, जुकाम, ब्रान्काईटिस, एनफ्रलुएन्जा, निमोनिया, टॉयफॉयड आदि रोग होने की सम्भावना कम हो जाती है। रोग होने की सम्भावना कम हो जाती है। छाती के रोग दूर होते हैं। श्लेष्माजनित रोग दूर होते है।

शवासन में प्राणायाम:

शवासन करें। सारे शरीर को सीधा करके साँस लेते-लेते दोनों हाथों को सिर के पीछे ले जाएँ। साँस छोड़ते हुए शरीर के पीछे ले जाएँ। ऐसा 10-20 बार करें। अब हाथों को विश्राम देते हुए बायाँ पैर सीधा करके ऊपर उठाएँ। कमर से पैर तक धरती के साथ समकोण बनाएँ। साँस त्यागते हुए बायाँ पाँव नीचे लाएँ। अब दायाँ पैर फिर उसी तरह ऊपर उठाएँ एवं नीचे लाएँ। बायाँ-दायाँ मिलाकर 10-10 बार ऐसा अभ्यास करें।

लाभ:

(1) हाथ-पैरों की स्नायु मजबूत होती है एवं हाथ-पैरों का वातरोग दूर होता है।

(2) 1 नं- प्राणायाम के सुफल तुरन्त मिलते हैं।

भ्रमण प्राणायाम:

धूल, सीलनयुक्त कमरे, दुर्गन्धयुक्त रास्तों गलियों में, मैदानों में यह व्यायाम नहीं करना चाहिए। मन-ही-मन में 1,2,3,4 या ओम्-ओम् का उच्चारण करते-करते पैरों को ताल मिलाते हुए रखें। चार पैर साँस लेते हुए तथा छः पैर साँस छोड़ते हुए टहलें। बीच में 1 मिनट सामान्य रूप से साँस लेते हुए चलें। तृतीय सप्ताह व चतुर्थ सप्ताह 6 पैर साँस लेते हुए 8 पैर साँस छोड़ते हुए चलें। पाँचवें व छठवें सप्ताह में पैरों की संख्या बढ़ाएँ। याद रखें हाँफना न पड़े।

लाभ:

(1) फेफड़ों तथा हृदय क्षमता में वृद्धि होती है।

(2) दमा, निमोनिया, टॉयफॉयड, बसन्त आदि भयावह रोगों के प्रतिरोधक के रूप में लाभदायक है।

(3) सर्दी-खाँसी के रोगियों में सुधार आता है। नियमित निष्ठापूर्वक यह व्यायाम करने से सुफल प्राप्त होते हैं।

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