मृत्‍यु होना जरूरी है मृत्यु न होती तो क्या होता | Death must happen, what if there was no death

दोस्‍तो, क्‍या आपने कभी सोचा है कि इस संसार में मृत्यु न होती तो क्‍या होता (What would have happened if there was no death) आज हम इसके बारे में चर्चा करेंगे और आपको इस लेख के माध्‍यम से इसके बारे में जानकारी देंगे। मृत्‍यु नहीं होती तो ऐसी बहुत सारी परिस्थियां उत्‍तपन हो जाती जिससे तो इस संसार को चलना बहुत की मुस्किल हो जाती पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती। जिसके कारण यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता।

क्या मृत्यु होना बुरी बात है? मृत्यु की बात सुनकर हीं लोगों के अन्‍दर भय पैदा हो जाता है। लोग घबरा जाते हैं, लेकिन यह तो एक वास्तिविक सत्‍य है जिससे कोई भी अछूता नहीं रह सकता। मृत्यु होना कोई बुरी बात नहीं ये तो एक स्‍वाभाविक प्रक्रिया है जिसे शरीर परिवर्तन करता है।

 

यदि मृत्यु होना बुरी बात नहीं है तो लोग इससे इतना डरते क्यों हैं?

हर लोगों की इच्‍छा होती की मेरी मृत्यु जल्‍द न हो क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है। वे अज्ञानतावश समझते हैं कि मृत्यु के समय बहुत कष्ट होता है। उन्होंने वेद, उपनिषद या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं।

 

मृत्यु के समय कैसा लगता है?

जब आप सोने के लिए बिस्तर पर जाते है तो उस समय जिस प्रकार नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता। जब आपकी मृत्यु किसी हादसे से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो। यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और अचेतावस्‍था में जाने लगता है।

 

मृत्यु के डर को दूर करने के लिए क्या करें?

जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ ( उपनिषद, दर्शन आदि ) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन, मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कम होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा। आप निडर हो जायेंगे। जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये। तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे?  नहीं उन्होंने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था। योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था।

महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ। तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाल मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता, प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है।

 

किन कारणों से पुनर्जन्म होता है ?

आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता। वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य। तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है ( The Soul is Reborn )। पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है।

 

पुनर्जन्म कब नहीं होता? | When doesn’t rebirth happen?

जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है। मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता क्योंकि, मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है। मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता उसके बाद होता है। सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता। यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो दुबारा से ये आत्मा शरीर धारण करती है।

 

मोक्ष की अवधि कब तक होती है?

मोक्ष का समय 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है और जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।

 

मोक्ष के बाद आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है? | How does the soul get a body after salvation?

सबसे पहले तो आत्मा को कल्प के आरम्भ ( सृष्टि आरम्भ ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है। जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान ( वायु,  आदित्य,  अग्नि, अंगिरा ) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया। क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं।

 

मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या जानवर का?

मोक्ष की अवधि पूरी करने के बाद मनुष्य शरीर ही मिलता है। क्योंकि मोक्ष को भोगने के बाद पुण्य कर्मों को तो भोग लिया, और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो फिर जानवर बनना सम्भव ही नहीं, तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है।

 

मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों बन्द हो जाता है?

मोक्ष होने से पुनर्जन्‍म बन्‍द हो जाता है क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं जो अच्छे या बुरे वे सब कट जाते हैं। तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा। पुनर्जन्म से छूटने का उपाय योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना है। जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा।

 

कर्म कितने प्रकार के होते हैं? | How many types of karma are there?

कर्म को मुख्‍य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है :- सात्विक कर्म, राजसिक कर्म, तामसिक कर्म।

(१) सात्विक कर्म :- सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि।

(२) राजसिक कर्म :- मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि।

(३) तामसिक कर्म :- चोरी, जारी, जूआ, ठग्गी, लूट मार, अधिकार हनन आदि ।

और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कहलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं। इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं। जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं।

 

किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है?

मनुष्‍य योनी में जन्‍म लेने के लिए सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है, यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में, यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा। जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा। 

 

इसको भी पढ़े : भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग | Twelve Jyotirlinga of Lord Shiva

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »
Scroll to Top