वास्तु शास्त्र क्या है जाने इसके रहस्‍य | Know the secrets of what is Vastu Shastra

दोस्तो, सदियों से हर इंसान एक सुखी जीवन जीने की लालसा में रहता है, फिर भी बहुत सारे लोग दुखी जीवन जीने को मजबूर होते हैं। उसके पीछे कौन सी बाधा है उसको नहीं जानने के कारण वे बेहद दुखी जीवन जीते है। जिसमें से एक वास्तु शास्त्र का ठीक नहीं होना भी है। इसलिए आज हम वास्तु शास्त्र के बारे में जानेंगे। वास्तु शास्त्र का अर्थ निवासस्थान होता है। जहां हम निवास करते हैं उस स्थान को निवासस्थान कहते हैं। वास्तु के द्वारा हमारे जीवन में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश इन सब तत्वों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में मदद मिलती हैं। जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश इन पाँचों तत्वों से ही हमारा शरीर का निर्माण हुआ है। इसलिए हमारे कार्य प्रदर्शन, स्वभाव, भाग्य एवं जीवन के अन्य पहलुओं पर इसका असर पड़ता है। वास्तु का संबंध दिशाओं और ऊर्जाओं से है। वास्तु के अंतर्गत दिशाओं को आधार बनाकर आसपास के मौजूद नकारात्मक ऊर्जाओं को सकारात्मक किया जाता है, जिससे वह मानव जीवन पर अपना प्रतिकूल प्रभाव ना डाल सकें। विश्व के प्रथम वास्तुविद् विश्वकर्मा जी के अनुसार शास्त्र के अनुकूल निर्मित भवन समस्त प्रकार के सुख, ऐश्वर्य और मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। प्राचीन में राजाओं एवं महराजाओं ने भी वास्तु शास्त्र के द्वारा ही अपने महलों का निर्माण करवाते थे। जिसका प्रमाण प्राचीन महलों को देखने से मिलता है। उचित यही होगा की भवन निर्माण के समय उसमें वास्तु शास्त्र का पूर्ण ध्यान रखा जाये जिससे जीवन में होने वाली बाधाओं से बचा जा सके। वास्तु सिद्धांत द्वारा निर्माण करवाया हुआ घर में हमेशा साकारात्मकता बनी रहती है।

वास्तु शास्त्र में आठ दिशाओं का महत्व

वास्तु शास्त्र में दिशाओं का महत्व बेहद जरूरी होती है। वास्तु में आठ दिशाएं महत्वपूर्ण होती है। इन आठ दिशाओं को ध्यान में रखकर ही भवन का निर्माण कराना चाहिए। जिससे भवन निर्माण के बाद सुख-शांति का विस्तार हो सके। और किसी भी प्रकार के अनिष्ठ होने से बचा जा सके तो आईये आज हम जानते है आठ दिशाओं के बारें में।

१.     उत्तर दिशा

२.     दक्षिण दिशा

३.     पूर्व दिशा

४.     पश्चिम दिशा

५.     उत्तर-पूर्व दिशा

६.     उत्तर-पश्चिम दिशा

७.     दक्षिण पूर्व दिशा

८.     दक्षिण पश्चिम दिशा

उत्तर दिशा

इस दिशा में मकान के खिड्की एवं दरवाजे तथा बालकनी वॉश बेसिन भी इसी दिशा में होने चाहिए। इस दिशा के स्वामी कुबेर होते है। इसलिए इस दिशा से धन लाभ होता है। इस दिशा में यदि कोई वास्तुदोष है तो धन की हानि और करियर में बाधाएं उत्पन्न होती है। इस दिशा में भूमि का उंचा होना वास्तु में अच्छा माना जाता है।

दक्षिण दिशा

इस दिशा के स्वामी यम हैं। इस दिशा की भूमि पर भार रखने से ग़हस्वामी सुखी एवं निरोगी होता है। इस दिशा को हमेशा बंद रखना ही उचित होता है। दक्षिण्दिशा में धन रखने की अलमिरा को रखना सदा उचित होता जिससे धन की बढ़ोतरी होती है। इस दिशा में खुलापन एवं शौचालय कभी नहीं होना चाहिए उससे हमेशा अनिष्ठ होता है।

पूर्व दिशा

इस दिशा में सूर्योदय होता है सूर्य की उर्जावान किरणें जब घर में में प्रवेश करती है तो हमेशा सकारात्मकता बनी रहती है। इस दिशा के राजा इंद्र हैं। गृहस्वामी की लंबी आयु एवं संतान सुख के लिए इस दिशा में प्रवेश द्वार और खिड्की होना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस दिशा में बच्चों के मुख करके पढ्ने से बेहतर होता है।  इस दिशा में दरवाजे होना बहुत हीं मंगलकारी एवं शुभ माना जाता है।

पश्चिम दिशा

इस दिशा में भूमि का स्वरूप हमेशा उंचा होना चाहिए। जिससे हमेशा ही सफलता एवं यश के लिए शुभ माना जाता है। इस दिशा के स्वामी वरुण है। यह दिशा सूर्यास्त की दिशा है, इसलिए इस दिशा की तरफ होकर सोना अशुभ माना जाता है। अगर घर का मुख्य द्वार पश्चिम की और मुख किये हुए है तो वास्तु शास्त्र में इसे अशुभ कहते है। इस दिशा में रसोईघर और टॉइलट होना चाहिए।

उत्तर पूर्व दिशा

यह दिशा ईशान कोण के नाम भी जाना जाता है। यह जल की दिशा होती है इस दिशा के स्वामी भगवान शंकर है। इस दिशा में घर का बरामदा, बोरिंग, स्वीमिंग पूल, पूजा स्थान का होना बेहद शुभ माना जाता है। घर के मुख्य द्वार भी इस दिशा में होना बेहद मंगलकारी माना गया है।

उत्तर पश्चिम दिशा  

उत्तर पश्चिम दिशा को वायव्य कोण के नाम से भी जाना जाता है। इस दिशा के राजा पवन देव है। इस दिशा में बेडरूम, गैरेज और गौशाला इत्यादि होना चाहिए।

दक्षिण पूर्व दिशा

यह दिशा अग्नि कोण के नाम से भी जाना जाता है। इस दिशा के स्वामी अग्नि देव है। इसलिए इस दिशा में किचन को होना उत्तम माना जाता है। इस दिशा में खाना बनाने का गैस एवं बॉयलर होना चाहिए।

दक्षिण पश्चिम दिशा

यह दिशा को नैऋत्य कोण के नाम भी जाना जाता है। इस दिशा के स्वामी राहु केतु है। इस दिशा में खिड्की और दरवाजे नहीं होने चाहिए। ग़हस्वामी का कमरा इस दिशा में होना चाहिए। धन और ज्वैलरी के लिए तिजोरी इस दिशा में रखने से धन-धान्य एवं खुशहाली आती है।

किन बातों का ध्यान रखें वास्तुशास्त्र में

  • जब भी नये भवन का निर्माण करें मुख्य द्वार, शयनकक्ष और भोजन करने का स्थान सबसे महत्वपूर्ण होती है।
  • मकान जब भी निर्माण करवाये तो खिड़कियां, शयनकक्ष, स्नानघर, आलमारी इत्यादि की दिशा वास्तुशास्त्र के अनुरूप ही होनी चाहिए।
  • भवन के निर्माण में मुख्य द्वार को कभी भी दक्षिण दिशा में नहीं होना चाहिए। ऐसे घरों में नकारात्मक ऊर्जा हमेशा बनी रहती है।
  • भवन बनवाने के समय रंग हमेशा वास्तु के अनुसार होना चाहिए। प्रत्येक रंग में भी वास्तु शास्त्र का मतलब होता है। घर के दरवाजों और खिड़कियों पर गहरा रंग उचित माना जाता है। घर की मुख्य दीवारों पर हल्का रंग पेंट करवाना चाहिए।
  • नये भवन बनाने से पूर्व नक्शा को हमेशा वास्तुशास्त्र के अनुरूप ही बनवायें जिससे भवन में हमेशा सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहेगा।

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